फिर आया हंगामों का दौर..! इस तारीख से शुरू हो रहा संसद का मानसून सत्र, जानिए एक मिनट का कितना आता है खर्च

फिर आया हंगामों का दौर..! इस तारीख से शुरू हो रहा संसद का मानसून सत्र, जानिए एक मिनट का कितना आता है खर्च
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नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र 22 जुलाई से शुरू होने वाला है। सत्र 9 अगस्त तक चलने की संभावना है। हालाँकि, अभी तक सरकार द्वारा इस संबंध में आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों द्वारा ये जानकारी सामने आई है। सरकार मानसून सत्र के दौरान 2024-2025 के लिए पूर्ण बजट भी पेश कर सकती है, वित्त मंत्रालय 17 जून तक विभिन्न मंत्रालयों और हितधारकों के साथ अपनी पूर्व-परामर्श बजट बैठकें शुरू कर देगा। सत्र में नवनिर्वाचित सदस्यों की शपथ/प्रतिज्ञा, अध्यक्ष का चुनाव, राष्ट्रपति का अभिभाषण और उसके बाद की चर्चाएँ भी शामिल होने की संभावना है। 

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजुजू ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि 18वीं लोकसभा का पहला सत्र 24 जून से 3 जुलाई तक चलेगा। इससे पहले 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अंतरिम बजट 2024-25 की घोषणा की थी, जिसमें पिछले 10 वर्षों के दौरान सरकार की आर्थिक उपलब्धियों और देश के दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के तरीके पर प्रकाश डाला गया था। वित्त मंत्री ने कहा था कि सरकार का ध्यान निरंतर बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देकर रोजगार सृजन पर है, साथ ही किसानों, युवाओं, महिलाओं और सबसे गरीब परिवारों जैसे समूहों को प्राथमिकता दी जा रही है। इस बीच, संसद का विशेष 8 दिवसीय सत्र 24 जून को शुरू होने वाला है, जिसके दौरान 26 जून को लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव होने की संभावना है, सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया। सूत्रों के अनुसार, 24 और 25 जून को नए सांसद शपथ लेंगे।

संसद सत्र और हंगामा:-

बता दें कि, बीते कुछ सालों से संसद में हंगामे को लेकर एक पैटर्न नज़र आया है, जो हर सत्र में देखा जाता है। इसमें सत्र शुरू होने से ठीक पहले कोई मुद्दा उछलता है, चाहे वो हाल का हो या फिर पुराना, लेकिन पूरी संसद उसी की भेंट चढ़ जाती है। उदाहरण के तौर पर, एक 2023 में एक सत्र के दौरान अरुणाचल प्रदेश में चीनी दखल का मुद्दा उठा था, विपक्ष ने इस पर सरकार को जमकर घेरा था। इस मामले में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में जवाब दिया और विपक्ष को बताया कि स्थिति स्थिर है और भारतीय सेना मोर्चे पर डटी हुई है। लेकिन, सदन में हंगामा जारी रहा, इसके बाद तत्कालीन कानून मंत्री खुद अरुणाचल की उस जगह पर गए और वहां से बयान दिया की सब ठीक है, सेना का भी बयान आया, लेकिन विपक्ष संसद के अंदर प्रधानमंत्री के बोलने की मांग करते हुए हंगामा करता रहा और सदन की कार्रवाई लगातार स्थगित होती रही। 

फिर एक अन्य सत्र में ऐसा ही अडानी मामले पर हुआ, ठीक सत्र से पहले हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आ गई, राहुल गांधी ने इसे सदन में पुरजोर तरीके से उठाया। सरकार की तरफ से कहा गया कि, जो आदमी (अडानी) सदन में नहीं है,  उसके बारे में चर्चा करने से क्या मतलब ? अगर फिर भी कोई संशय है तो अदालत के दरवाजे खुले हैं, वहां केस करिए। लेकिन विपक्ष इस मामले में संसदीय समिति (JPC) जांच की मांग करते हुए हंगामा करते रहा, नतीजा संसद ठप्प। हालाँकि, सरकार ने खुद ही इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में जांच के लिए भेज दिया, जिसमे अडानी के खिलाफ कुछ भी अनियमित नहीं पाया गया। लेकिन तब तक संसद हंगामे की भेंट चढ़ चुका था। 

ऐसे ही एक सत्र में पेगासस का मुद्दा उछला, राहुल गांधी, महुआ मोइत्रा समेत कई सांसदों ने आरोप लगाए कि उनके फोन टेप किए गए, इस पर भी संसद में कई दिन हंगामा चला। सुप्रीम कोर्ट में बात पहुंची, जब अदालत ने जांच करने के लिए आरोप लगाने वालों से फोन माँगा, तो राहुल समेत इन सांसदों ने अपना फोन देने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कुल 29 फोन की जांच की, मगर किसी में भी फोन में पेगासस नहीं पाया गया। लेकिन, इन हंगामों की वजह से संसद का काम नहीं हो पाया। इसी प्रकार राफेल को लेकर संसद के कई दिन बर्बाद किए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जब मामला चला, तो इस सौदे में कुछ गड़बड़ नहीं निकली और सरकार को क्लीन चिट दे दी गई। कई बार ये भी होता है कि, जब कोई मुद्दा नहीं होता, और सरकार बिल पास कर रही होती है, तो विपक्ष सदन का बॉयकॉट कर जाता है, फिर बाद में कहा जाता है कि, बिना चर्चा के बिल पास कर दिया गया और फिर हंगामा।  

संसद में जनता के लिए नीतियां, कानून बनाने हेतु बिल पेश किए जाते हैं, उन पर पक्ष विपक्ष में चर्चा होती है और फिर उन्हें पारित किया जाता है, लेकिन सोचिए जब किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा होनी हो और उस बीच ऐसे किसी मुद्दे को उछालकर हंगामा शुरू कर दिया जाए, तो संसद कैसे चले और नीतियां कैसे बने ? आख़िरकार, 10 साल में पहली बार गत वर्ष सरकार ने हंगामा करने वाले सांसदों पर कार्रवाई की थी, और कई सांसदों को निलंबित कर दिया था, लेकिन फिर ये सांसद सदन के बाहर हंगामा करते नज़र आए थे और गांधी प्रतिमा के सामने धरना देने बैठ गए थे। 

बता दें कि, संसद की प्रत्येक कार्यवाही पर करीब हर मिनट में ढाई लाख रुपये खर्च आता है, यानी हर घंटे का लगभग डेढ़ करोड़ रुपये। और ये पैसा किसी सांसद की जेब से नहीं जाता, बल्कि जनता के टैक्स से जाता है। ऐसे में जब हंगामे के कारण कई कई दिन संसद की कार्रवाई ठप्प रह जाती है, तो सोचिए कि जनता के पैसों की कितनी बर्बादी होती होगी। विपक्ष का काम सरकार की नीतियों का विरोध करना है, लेकिन तथ्यों के आधार पर, अनावश्यक मुद्दों पर हंगामा करके जनता के पैसों की बर्बादी करने से सांसद खुद अपनी ही साख को बट्टा लगाते हैं। अब उम्मीद तो यही है कि, इस सत्र में कुछ काम होगा और जनता के लिए लाभकारी फैसले लिए जाएंगे, बस हंगामा न हो। 

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