विधायक छुपाओ ताज बचाओ, क्या है इसका इतिहास ?

बंगलुरु: कर्नाटक की सियासत पर अभी अंतिम चाल खेली जानी बाकि है, बीजेपी को बहुमत सिद्ध करने के लिए 8 विधायकों की जरुरत है, जबकि कांग्रेस ने जेडीएस के हाथ मिलकर पहले ही बहुमत हासिल कर चुकी है. अब बीजेपी 8 विधायक जुटाने में लगी है और कांग्रेस उन्हें बीजेपी की पकड़ से बचाने के लिए रिजॉर्टों में छुपा रही है, ताकि वे बीजेपी के प्रलोभन में में आकर पार्टी न बदल लें. हालांकि ये पहली बार नहीं हो रहा है, त्रिशंकु विधानसभा में पहले भी ऐसा होता रहा है. 

1984 में आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के मुखिया एनटी रामाराव को बहुमत साबित करने के लिए महीने भर का समय दिया गया था. तब कर्नाटक के मुख्यमंत्री आरके हेगड़े ने उन्हें विधायकों के साथ कर्नाटक के देवानाहैली रिजॉर्ट में शरण दी थी. वहीं 2002 में महाराष्ट्र में कांग्रेस के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को अपनी सरकार बचाने के लिए 40 विधायकों के साथ बेंगलुरु में शरण लेनी पड़ी थी और यहीं से सीधे महाराष्ट्र विधानसभा में जाकर उन्होंने अपना बहुमत साबित किया था. 2004 में भी  14 साल पहले हुए चुनाव में बीजेपी 90 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें हासिल हुई. जेडीएस ने अपने विधायकों को बचाने के लिए बेंगलुरु के एक रिजॉर्ट में छिपाकर रखा था. तब भी जेडीएस ने कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया और उसके विधायक रिजॉर्ट से सीधे विधानसभा में वोट डालने पहुंचे थे.

वर्ष 2008 में वापिस कर्नाटक की राजनीति में विधायकों को छुपाने का सिलसिला शुरू हुआ था, उस समय राज्य में 110 सीटों के साथ बहुमत के बेहद करीब पहुंची बीजेपी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया. बीजेपी को सरकार बनाने से रोकने के लिए कांग्रेस और जेडीएस ने अपने विधायकों को बचाए रखने के लिए बेंगलुरु के एक रिजॉर्ट में कई दिनों तक रोके रखा था. पिछले साल भी जब गुजरात में राज्यसभा चुनाव का पेच जबरदस्त तरीके से फंस गया तब कांग्रेस ने अपने 44 विधायकों को बचाने को एकजुट बनाए रखने के लिए बेंगलुरु के ईगलटन रिजॉर्ट में कई दिनों तक रखा था. वैसे ही हालत आज भी हैं, आज बीजेपी को बहुमत सिद्ध करना है. अब देखना ये है कि क्या बीजेपी, विधायकों को अपने पक्ष में करने कि जुगत भिड़ा पाएगी ?

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