राजनीती के लिए बनते मुद्दे और मुद्दों से भटकती राजनीति

आज से तीन-चार दशक पहले की हिंदी फिल्मो में रोटी, कपडा, मकान, बिजली, शिक्षा, गरीबी, भ्रष्टाचार, नारी सम्मान, किसान, आतंकवाद, पडोसी देशों से मनमुटाव जेसे मुद्दे देखे जा सकते है. फिल्में समाज का दर्पण है. पहले कहानियां समाज में घटित होती है बाद में उनका पर्दे पर रूपांतरण होता है. फिल्में अपनी जिम्मेदारियों को निभा चुकी है, मतलब साफ है अब सरकार की बारी थी. सरकारें आई सरकारें गई मगर ये मुद्दे देश की छाती पर आज भी मुंग दल रहा है. आलम अब मुद्दों को दबाने तक आ पंहुचा है, सच की आवाज दबा दी जा रही है जो नया भी नहीं है, मगर इन दिनों एक अलग ही औजार जनता को भटकाने के कम में लाया जा रहा है, जिसका नाम है मुद्दे बनाना.


देश के जरुरी मुद्दों से देश को भटकाने के लिए मुद्दे बनाने का काम जोरो से चल रहा है. प्रचार प्रसार तंत्र जिसे सोशल और मीडिया नाम से जाना जा रहा है उसमे सबसे बड़े सहायक के रूप में उभर कर आया है. राजनेता का मंदिर जाना, किसी भी बयान को मनमाफिक तरीके से पेश करना, सच और झूठ में से किसे कब दिखाने की कारीगरी,और नेताओ की गिरी हुई भाषा शैली इस मुहिम के अन्य सहायक है. देश के असली हालात सभी को पता है मगर सियासत उस दौर में पहुच चुकी है जहा यदि मूल मुद्दे सुलझा लिए गए तो सियासतदारो की अगली पीढ़ी क्या खायेगी. ऐसे में सोच समझ कर एक एक कदम रखा जा रहा है और अपनी रोटी सेकने के चक्कर में मुल्क को आग लगाने का दस्तूर फ़िलहाल जारी है.

कुसूर वारो में जनता भी शामिल है पहले भी थी. पहले कुछ जानती नहीं थी अनजान थी और अब सब कुछ जानती है तो अनजान बन कर जी रही है. कुछ कोशिशे जो की जा रही होती है तुरंत दबा दी जाती है. आलम यह है कि कोई चुनावों के पहले मंदिर मंदिर भटक रहा है तो कोई पकोड़े तलने और आधार कार्ड को ही विकास और रोजगार के नाम से गुंजायमान करने में तुला है. जल्द ही कोर्ट को भी खुद के सुप्रीम होने के लिए आधार कार्ड बनवाकर सुबूत पेश करने होंगे. मगर सवाल आज भी रोटी, कपडा, मकान, बिजली, शिक्षा, गरीबी, भ्रष्टाचार, नारी सम्मान, किसान, आतंकवाद, पडोसी देशों से मनमुटाव जैसे ही है जो फ़िलहाल आगे भी रहेंगे......

 

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