आखिर क्यों इस महिला खिलाड़ी बनी कोच, सच जानकर उड़ जाएंगे होश

क्रिकेट कोच की बात करें तो आज हर किसी को रवि शास्‍त्री (Ravi Shastri), राहुल द्रविड़ (Rahul Dravid) के नाम याद आ रहे होंगे, मगर क्‍या आप देश में पहली महिला क्रिकेट कोच के बारे में जानते हैं , जिनसे सीखकर दीप दास गुप्‍ता ने इंग्‍लैंड के खिलाफ शतक जड़ा था. जी हां, दीप दास गुप्‍ता (Deep Das Gupta) की कोच महिला थीं, मगर उन्‍होंने देश को एक नहीं उनके जैसे कई क्रिकेटर दिए. सुनीता शर्मा (Sunita Sharma) भारत की पहली महिला क्रिकेट कोच हैं. उन्‍होंने कई फर्स्‍ट क्‍लास और इंटरनेशनल क्रिकेटर्स को तैयार किया. 2005 में सुनीता को क्रिकेट के क्षेत्र में बेहतरीन काम करने के लिए द्रोणाचार्य अवॉर्ड दिया गया. इस गुरु ने देश को कई वर्ल्‍ड क्‍लास क्रिकेटर दिए, मगर उनका खुद का सपना एक वर्ल्‍ड क्‍लास क्रिकेटर बनने का था. ऑस्‍ट्रेलिया के खिलाफ टीम इंडिया में उन्‍हें चुन भी लिया गया था, मगर उनके अनुसार प्‍लइेंग इलेवन में होने के बावजूद मैच वाले दिन सुबह उन्‍हें बाहर कर दिया गया.

मां के कारण कोच बनीं: इसके बाद सुनीता की मां ने क्रिकेट कोचिंग प्रोग्राम में उनका एडमिशन करवा दिया. 1976 में वह पाटियाला में नेशनल इंस्‍टीट्यूट से कोचिंग डिप्‍लोमा हासिल करने वाली पहली महिला बनीं. सुनीता के अनुसार शुरुआत में लोग अपने बच्‍चों को उनके पास भेजने से हिचकते थे, क्‍योंकि वे पुरुष कोच पसंद करते थे, मगर एक साल बाद लोगों को पता चला कि वे अपने पुरुष सहयोगियों की तुलना में उतनी ही सक्षम हैं. सुनीता को बचपन से ही खो खो में रूचि थी और उन्‍होंने खो खो में नेशनल स्‍तर तक खेला है, मगर परिवार के कहने पर उन्‍होंने बाद में अपना खेल बदल लिया. दरअसल एक बार उनकी मां ने देखा कि वें खो खो में काफी समय दे रही हैं; इसके बाद मां के समझाने पर कि इससे मतलब नहीं है कि आप इस खेल में कितने अच्‍छे हो, इससे आपका करियर नहीं बनेगा. न तो यह नेशनल गेम है और न ही इंटरनेशनल गेम. इसीलिए क्रिकेट में खुद को आजमाने की तैयारी करो, क्‍योंकि यह काफी लोकप्रिय खेल है. सुनीता ने मां की सलाह को गंभीरता से लिया और क्रिकेट की तरफ ध्‍यान देना शुरू किया. जल्‍द ही वो मिडियम पेसर के रूप में चयनकर्ताओं की नजरों में आ गई. हालांकि खिलाड़ी के रूप में उनका करियर ज्‍यादा नहीं चल पाया.

महिला कोच होकर पुरुष खिलाडि़यों को क्रिकेट के गुर सिखना सुनीता के आसान नहीं था. उन्‍हें भेदभाव का भी सामना करना पड़ा, मगर जल्‍द ही सभी को समझ में आ गया था कि उनमें यहां तक पहुंचने और एक खिलाड़ी को निखारने की काबिलियत है.मां और गुरु दोनों की जिम्‍मेदारी निभाई सुनीता ने अपने करियर में मां और गुरु दोनों की जिम्‍मेदारी निभाई. दो बच्‍चों की मां जब गुरु की भूमिका में आती थी तो पांच घंटे अपने स्‍टूडेंट्स के साथ मैदान पर बल्‍लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग पर काम करती थी. मगर एक बार घर आने के बाद वह हाउस वाइफ बन जाती और घर के काम और बच्‍चों को संभालने में लग जाती थी.

सुनीता से ही ट्रेनिंग लेना चाहते थे दीप दास: दीप दास गुप्‍ता ने 7 साल की उम्र में क्रिकेट की ट्रेनिंग लेनी शुरू की थी. हालांकि उनके माता पिता अपने बेटे के लिए एक पुरुष कोच चाहते थे, मगर युवा दीप दास ने जोर देकर कहा कि वह 'आंटी' से ली ट्रेनिंग लेंगे. दरअसल बच्‍चों के लिए सुनीता देखभाल करने वाली एक महिला थी, जो उन्‍हें क्रिकेट की बारिकियां सिखाती थीं. सुनीता उस समय सुर्खियों में आई, जब मोहाली में इंग्‍लैंड के खिलाफ दीप दास गुप्‍ता ने शतक जड़कर उन्‍हें गुरु दक्षिणा दी. इस दिग्‍गज कोच ने शशि गुप्‍ता, अंजु जैन, अंजुम चोपड़ा जैसे खिलाड़ियों को भी ट्रेनिंग दी हैं. 1975 से 1990 के बीच उन्‍होंने शांता रंगास्‍वामी, डायना एडुल्‍जी, संध्‍या अग्रवाल जैसे इंटरनेशनल महिला क्रिकेटर्स के लिए कोचिंग कैंप लगाया था.

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