भारत को जिस कंपनी ने बनाया था 'गुलाम', आज एक भारतीय ही है उसका मालिक

नई दिल्ली: पूरा देश आज सोमवार को स्वतंत्रता दिवस की 75वीं सालगिरह मना रहा है। इसके उपलक्ष्य में बीते वर्ष भर से देश में 'आजादी का अमृत महोत्सव' मनाया जा रहा है। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिलने के बाद से अब तक भारत की यात्रा बड़ी रोचक रही है। इन 75 वर्षों के चलते भारत एक बड़ी आर्थिक ताकत बनकर उभरा है। भारत की बढ़ती आर्थिक हैसियत का अनुमान इस बात से भी लगा सकते हैं कि जिस 'ईस्ट इंडिया कंपनी' ने भारत को गुलाम बनाया था, आज एक भारतीय बिजनेसमैन ही उस कंपनी का मालिक बन बैठा है।

ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम भला कौन भारतीय नहीं जानता होगा! जिस किसी ने 8वीं-10वीं तक भी इतिहास पढ़ा है, उसे इस कंपनी का नाम अच्छी तरह पता होगा। यहां तक कि जो लोग कभी विद्यालय नहीं गए, वे भी कंपनी राज के नाम से ईस्ट इंडिया कंपनी से गाहे-बेगाहे अवगत हैं। 17वीं सदी के आरम्भ में यानी सन 1600 ईस्वी के आस-पास भारत की जमीन पर पहला कदम रखने वाली इस कंपनी ने सैकड़ों वर्ष तक हमारे देश पर शासन किया। 1857 तक भारत पर इसी कंपनी का कब्जा था, जिसे कंपनी राज के नाम से इतिहास में पढ़ाया जाता है।

वही एक हिसाब से बोले तो ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की पहली कंपनी थी, भले ही यह भारतीय न होकर अंग्रेजों की थी। इसी कंपनी ने भारत को गुलामी की बेड़ियां भी पहनाई। एक वक़्त यह कंपनी एग्रीकल्चर से लेकर माइनिंग एवं रेलवे तक सारे काम करती थी। अब मजेदार है कि भारत को गुलाम बनाने वाली इस ईस्ट इंडिया कंपनी के मालिक भारतीय मूल के कारोबारी संजीव मेहता (Sanjiv Mehta) हैं। मेहता ने ईस्ट इंडिया कंपनी को खरीदने के पश्चात् इसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म बना दिया। अभी यह कंपनी चाय, कॉफी, चॉकलेट आदि की ऑनलाइन बिक्री करती है। ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना सन 1600 में 31 दिसंबर को हुई थी। इस कंपनी को बनाने के पीछे एकमात्र लक्ष्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद एवं औनपिवेशीकरण को बढ़ावा देना था। ब्रिटेन के उस दौर के बारे में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि ब्रिटिश राज में सूरज कभी अस्त नहीं होता। सूरज के परिक्रमा पथ की परिधि से भी ब्रिटिश साम्राज्य को बड़ा बना देने में सबसे महत्वपूर्ण योगदान इसी ईस्ट इंडिया कंपनी का था। कंपनी मूलत: कारोबार करने के लिए बनाई गई थी, किंतु उसे कई विशेषाधिकार प्राप्त थे, जैसे युद्ध करने का अधिकार। कंपनी को ब्रिटिश राज ने यह अधिकार अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करने के लिए दिया था। इस वजह से ईस्ट इंडिया कंपनी के पास अपनी ताकतवर सेना भी हुआ करती थी। 1600 के दशक के समय में साम्राज्यवाद एवं कारोबार की होड़ में स्पेन और पुर्तगाल का जलवा था। ब्रिटेन एवं फ्रांस इसमें देर से उतरे थे किन्तु तेजी से दबदबा बढ़ा रहे थे। पुर्तगाल के नाविक वास्कोडिगामा के भारत आने के पश्चात् यूरोप में बड़ा परिवर्तन आया। वास्कोडिगामा अपने साथ जहाजों में भरकर भारतीय मसाले ले गया था। यूरोप के लिए भारतीय मसाले अनोखी चीज थी। इन मसालों से वास्कोडिगामा ने अकूत संपत्ति अर्जित की। तत्पश्चात, पूरे यूरोप में भारतीय मसालों की महक पसर गई। भारत की संपन्नता के चर्चों ने भी यूरोपीय साम्राज्यवादी देशों को यहां दबदबा बनाने के लिए प्रेरित किया। ब्रिटेन की तरफ से यह काम किया ईस्ट इंडिया कंपनी ने। इस कंपनी को पहली कामयाबी हाथ लगी थी पुर्तगाल का एक जहाज लूटने से, जो भारत से मसाले भरकर ले जा रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी को उस लूट में 900 टन मसाले प्राप्त हुए। इसे बेचकर कंपनी ने जबरदस्त फायदा कमाया। यह उस समय की पहली चार्टेड ज्वाइंट स्टॉक कंपनियों में से एक थी, यानी कहें तो अभी के शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों की भांति कोई भी निवेशक उसका भागीदार बन सकता था। लूट की कमाई का हिस्सा कंपनी के निवेशकों को भी मिला। इतिहास की पुस्तकों में बताया जाता है कि लूट से किए गए पहले व्यापार में ईस्ट इंडिया कंपनी को लगभग 300 प्रतिशत का जबरदस्त फायदा हुआ था।

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