सिर्फ होली के रंग बनाने के लिए ही नहीं, बल्कि कई बिमारियों से बचाने के लिए भी इस्तेमाल होता है टेसू

इंदौर: जंगलों में पलाश या टेसू का फूल बसंत के आगाज़ के साथ ही खिलने लगते हैं। इसके फूल ही नहीं पत्ते, टहनी, फली व जड़ तक का आयुर्वेदिक और धार्मिक रूप से अपना अलग महत्व है। आयुर्वेद की मानें तो होली के लिए रंग बनाने के साथ ही इसके फूलों को पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है। यही नहीं इसकी पत्तियों के इस्तेमाल से त्वचा संबंधी रोग भी दूर होते हैं।

कुछ सालों पहले तक टेसू के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों से ही होली खेली जाती थी। ये प्राकृतिक रंग त्वचा के लिए भी लाभकारी होते थे। किन्तु  धीरे-धीरे वक़्त जितनी तेज गति से आगे बढ़ा, उतनी ही तेजी से केमिकल युक्त रंगों ने मार्केट में अपनी पकड़ बना ली। अब प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल न के बराबर ही होता है।

टेसू के फूलों से रंग बनाकर केवल होली ही नहीं खेली जाती, बल्कि इसके पानी से नहाया भी जाता है। पर्यावरणविदों के मुताबिक टेसू के फूलों को रात में पानी में भिगोकर रख दें। सुबह इस पानी को पतले कपड़े से छान लीजिए। जिससे कि फूल, पत्ती सब अलग हो जाएंगी और बचे हुए पानी को नहाने में इस्तेमाल करें। इस पानी के नहाने मात्र से ताजगी का अनुभव होता है। इसका उपयोग करने वाले को लू भी नहीं लगती और गर्मी का प्रभाव भी कम हो जाता है।

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