संस्कृत भाषा के अगाध ग्यानी थे स्वामी दयानंद सरस्वती, दिया था राष्ट्रीयता का उपदेश

Feb 28 2019 12:40 PM
संस्कृत भाषा के अगाध ग्यानी थे स्वामी दयानंद सरस्वती, दिया था राष्ट्रीयता का उपदेश

आप सभी जानते ही होंगे कि आज समाज-सुधारक स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र जिला राजकोट, गुजरात में हुआ था. आप सभी को यह भी बता दें कि सन् 1824 में एक ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ था और कहा जाता है कि उनका जन्म मूल नक्षत्र में होने के कारण उनका नाम मूलशंकर रखा गया था. ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं इनके बारे में कुछ ऐसी बातें जिन्हे जानने के बाद आप हैरान रह जाएंगे.

कहा जाता है महर्षि दयानंद सरस्वती का भारतीय स्वतंत्रता अभियान में भी बहुत बड़ा योगदान था और उन्होंने वेदों का प्रचार करने के लिए पूरे देश का दौरा करके पंडित और विद्वानों को वेदों की महत्ता के बारे में समझाया. इसी के साथ संस्कृत भाषा में उन्हें अगाध ज्ञान होने के कारण स्वामीजी संस्कृत को एक धारावाहिक रूप में बोलते थे और उन्होंने ईसाई और मुस्लिम धर्मग्रंथों पर काफी मंथन करने के बाद अकेले ही तीन मोर्चों पर अपना संघर्ष आरंभ किया जिसमें उन्हें अपमान, कलंक और कई कष्टों को झेलना पड़ा. आप सभी को बता दें कि उनके ज्ञान का कोई जवाब नहीं था और 'भारत, भारतीयों का है' यह उनके प्रमुख उद्‍गार है.

कहते हैं स्वामी जी के नेतृत्व में ही 1857 के स्वतंत्रता संग्राम क्रांति की सम्पूर्ण योजना तैयार की गई थी और वही उसके प्रमुख सूत्रधार थे और 'भारत, भारतीयों का है' यह अंग्रेजों के अत्याचारी शासन से तंग आ चुके भारत में कहने का साहस भी सिर्फ दयानंद में ही था. ऐसा भी कहा जाता है उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से भारतवासियों को राष्ट्रीयता का उपदेश दिया और भारतीयों को देश पर मर मिटने के लिए प्रेरित करते रहे और सभी को एक करने में जुटे रहे. एक बार उनके किसी तीखे उत्तर से तिलमिलाई अंग्रेजी सरकार ने उन्हें समाप्त करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्र रचे और उसके बाद स्वामी जी की देहांत सन् 1883 को दीपावली के दिन शाम को हो गया था.

इस कारण से दयानन्द सरस्वती जी ने की थी आर्य समाज की स्थापना

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