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न्यायालय खत्म कर सकता है कूलिंग पीरियड

Sep 13 2017 12:11 PM
न्यायालय खत्म कर सकता है कूलिंग पीरियड

नईदिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदू मैरिज एक्ट के तहत अपनाई जाने वाली तलाक की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। तलाक के एक मामले में पति पत्नी की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि, परंपरागत तरीके से हिंदू लॉ जब कोडिफाइंड नहीं हुआ था तब शादी एक धार्मिक संस्कार माना जाता था। वह रिश्ता सहमति से खत्म नहीं हो सकता था। हिंदू मैरिज ऐक्ट आने के बाद तलाक का प्रावधान आया। 1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान किया गया।

अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि दोनों ही पक्षों में समझौते की कोई संभावना न हो तो, फिर 6 माह के कूलिंग पीरियड जिसे वेटिंग पीरियड भी कहा जाता है, को न्यायालय समाप्त कर सकता है। दरअसल न्यायालय दिल्ली के एक दंपति को लेकर अपनी सुनवाई कर रहा था। दंपत्ति 16 जनवरी 1994 को विवाह बंधन में बंधा था। विवाह के बाद उनकी दो संतानें हुईं। विवाद होने पर वर्ष 2008 में दोनों अलग हो गए।

दोनों ने न्यायालय में वाद दायर किया। तलाक के इस मसले पर न्यायालय सलाहकार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि न्यायालय 6 माह के समय को समाप्त कर सकता है, ऐसा विवाद जिसमें समझौते पर बात हुई थी मगर यह सफल नहीं हो सका, दंपत्ति के बीच अलगाव हो, दोनों काफी समय से अलग रह रहे हों। सलाहकार का कहना था कि वेटिंग में दोनों को इंतजार करना पड़ जाए तो वह एक कष्ट की तरह होगा।

गौरतलब है कि सहमति से तलाक के मामले में पहले व आखिरी मोशन के मध्य लगभग 6 माह का समय दिया जाता है। यह समय इसलिए दिया जाता है कि अंतिम समय तक भी दोनों ही पक्षकारों के बीच समझौता हो सके। इस तरह का प्रावधान हिंदू मैरिज एक्ट के अंतर्गत वर्णित है। दोनों ही पक्षकार यदि बच्चे की कस्टडी, गुजारे, भत्ते और अन्य विवाद को लेकर समाधान पर पहुॅंच गए हैं तो, फिर न्यायालय द्वारा 6 माह की अवधि को समाप्त किया जा सकता है। न्यायालय ने 6 माह की इस अवधि को केवल निर्देशक बताया है।

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