खुद के नाम से बहुत चिढ़ते थे सुमित्रानंदन पंत, जानिए क्या थी वजह

'छायावादी युग' के 4 प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत हिंदी काव्य की नई धारा के प्रवर्तक भी कहे जाते है. इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', पंत और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग बोला जा रहा है. सुमित्रानंदन पंत परंपरावादी आलोचकों के सामने कभी झुके नहीं. वह ऐसे साहित्यकारों में भी शुमार किए जाते है, जिनके काव्य में प्रकृति-चित्रण समकालीन कवियों में सबसे अच्छा था. पंत ने महात्मा गांधी से प्रभावित होकर भी कई रचनाएं भी कर दी थी. सुकोमल कविताओं के रचयिता सुमित्रानंदन पंत ने 27 दिसंबर, 1977 को इस संसार को अलविदा बोल दिया.

पंत का बचपन: बता दें कि सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई, 1900 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के कौसानी गांव में हुआ. इनके जन्म के 6 घंटे के उपरांत ही इनकी माता का देहांत हो गया था. बचपन में उन्हें सब 'गुसाईं दत्त' के नाम से पहचाने जाने लगे थे. माता के देहांत के उपरांत वह अपनी दादी के पास रहते थे. 7  वर्ष की आयु में जब वह चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, तभी उन्होंने कविता लिखना शुरू कर चुके है. सन् 1917 में पंत अपने मंझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे. यहां से उन्होंने माध्यमिक शिक्षा भी हासिल कर ली थी. 

गुसाईं कैसे बनें सुमित्रानंदन पंत: बता दें कि उन्हें अपना नाम गुसाईं दत्त पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर सुमित्रानंदन पंत कर लिया था. काशी के क्वींस कॉलेज में कुछ दिन शिक्षा लेकर वह इलाहाबाद चले गए और वहां के म्योर कॉलेज में पढ़ने लगे. वह इलाहाबाद में कचहरी के पास एक सरकारी बंगले में अपना जीवन यापन करते थे. उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी काम किया.

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