चाहे पूरी 'दुनिया' ख़त्म हो जाए, फिर भी जीवित रहेंगे ये 7 महामानव

Mar 01 2021 02:34 PM
चाहे पूरी 'दुनिया' ख़त्म हो जाए, फिर भी जीवित रहेंगे ये 7 महामानव

आज तक हम सुनते आए हैं कि जिसने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन काल का ग्रास बनना ही है, दुनिया में कोई अमर नहीं है। लेकिन हमारे हिन्दू धर्म के ग्रंथों के अनुसार, विश्व में 7 पौराणिक पात्र अमर हैं, जिन्हे सप्त चिरंजीवी के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि युग बीत जाएं, कल्प बीत जाएं, प्रलय आ जाए लेकिन ये सप्त चिरंजीवी धरती पर जीवित रहेंगे। दरअसल, ये सातों महामानव किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और दिव्य सिद्धियों से संपन्न हैं। आज हम आपको इन्ही सप्त चिरंजीवियों के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं। 

1. हनुमान:-

पवन पुत्र हनुमान को अजर अमर रहने का वरदान प्राप्त है। वे त्रेता युग में भगवान श्री राम के परम भक्त रहे हैं। हजारों वर्षों बाद वे द्वापर युग में हुई महाभारत में भी दिखाई देते हैं। महाभारत में एक घटना आती है जब भीम, हनुमान जी को उनकी पूँछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, मगर भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूँछ नहीं हटा पाते हैं। इस तरह हनुमान जी, भीम का सर्वशक्तिशाली होने का घमंड भी तोड़ते हैं। कहा जाता है कि सीता जी ने हनुमान को लंका की अशोक वाटिका में राम का संदेश सुनने के बाद आशीर्वाद दिया था कि वे अजर-अमर रहेंगे, वहीं किवदंती यह भी है कि श्री राम ने जल समाधी लेने से पहले हनुमान जी को कलियुग के अंत तक पृथ्वी पर रहकर मानवता को बरक़रार रखने का आदेश दिया था।

2. परशुराम :-

परशुराम, श्री हरी विष्णु के छठें अवतार हैं। परशुराम के पिता का नाम ऋषि जमदग्नि और माता का रेणुका था। माता रेणुका ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम क्रमशः वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम थे। राम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। शिवजी ने राम की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपना फरसा (एक हथियार) दिया था। इसी कारण राम परशुराम कहलाने लगे। भगवान पराशुराम, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम से पहले हुए थे, लेकिन वे चिरंजीवी होने के कारण राम के समय में भी जीवित थे। रामायण के एक प्रसंग के अनुसार, भगवान परशुराम, श्री राम द्वारा शिव धनुष तोड़े जाने के समय भी उपस्थित थे। 

3. बलि :-

राजा बलि के दान के चर्चे दूर-दूर तक थे। देवताओं को युद्ध में हारने के बाद राजा बलि ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। बलि सतयुग में भगवान वामन अवतार के वक़्त हुए थे। राजा बलि का घमंड तोड़ने के लिए भगवान ने ब्राह्मण का भेष धरकर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी थी। इस पर राजा बलि ने वामन महाराज से कहा था कि जहाँ आपकी इच्छा हो तीन पैर रख दो। तब भगवान ने अपना विराट रूप धारण कर दो पगों में तीनों लोक नाप दिए और तीसरा पग बलि के सर पर रखकर उसे पाताल लोक में भेज दिया। राजा बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अमरता का वरदान दिया और उनका द्वारपाल बनना भी स्वीकार किया, शास्त्रों के मुताबिक, राजा बलि, भक्त प्रहलाद के वंशज हैं। 

4. विभिषण:-

लंकापति रावण के छोटे भाई हैं विभीषण। विभीषण भी श्री राम के अनन्य भक्त हैं। जब रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था, उस समय विभीषण ने रावण को श्रीराम से शत्रुता न करने के लिए काफी बार समझाया था। इस बात पर रावण ने विभीषण को लंका से निष्काषित कर दिया था। विभीषण श्रीराम की सेवा में चले गए और रावण के अधर्म को मिटाने में धर्म का साथ दिया। कहा जाता है कि श्री राम के प्रताप से विभीषण भी अमर हैं।  

5. अश्वत्थामा: -

कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं अश्वथामा । ग्रंथों में भगवान शिव के अनेक अवतारों का उल्लेख भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी धरती पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में महाभारत का युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। धर्म ग्रंथों के मुताबिक, भगवान श्रीकृष्ण ने ही ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण अश्वत्थामा के सिर में लगी मणि को वापस लेकर उन्हें चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था।

6. ऋषि व्यास :-

ऋषि व्यास, जो वेद व्यास के नाम से अधिक मशहूर हैं, को ही चारों वेद ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद और यजुर्वेद, सभी 18 पुराणों, महाभारत और श्रीमद्भागवत् गीता का रचनाकार माना जाता है। वेद व्यास, ऋषि पाराशर और सत्यवती के पुत्र थे। इनका जन्म यमुना नदी के एक द्वीप पर हुआ था और इनका रंग सांवला था, इसी वजह से इन्हे कृष्ण द्वैपायन कहा जाता है। इन्हे भी अमर माना जाता है। 

7. कृपाचार्य:-

कृपाचार्य, अश्वथामा के मामा और कौरवों के कुलगुरु थे। शिकार खेलने के दौरान शांतनु को दो शिशुओं की प्राप्ति हुई थी। उन दोनों का नाम कृपी और कृप रखकर शांतनु ने उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की तरफ से लाडे थे। कृप और कृपि का जन्म महर्षि गौतम के पुत्र शरद्वान के वीर्य के सरकंडे पर गिरने की वजह से हुआ था। इन्हे भी अमर माना जाता है।  

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