माँ जानकी जयंती: श्रीराम के चरण चिह्नों पर नहीं रखती थीं पाँव

आप सभी जानते ही होंगे कि फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को माता सीता के पूजन का दिन है और कहते हैं कि इस दिन माता सीता धरती पर अवतरित हुईं थी. इसी के साथ ऐसा भी कहते हैं कि इस दिन को सीता अष्टमी या जानकी जयंती नाम से जाना जाता है जो  25 और 26 फरवरी को मनाई जा रही है. माता सीता एक आदर्श स्त्री का उदाहरण हैं. वहीं माता सीता को सौभाग्य की देवी मां लक्ष्मी के अवतार पद्या के रूप में मानते हैं. कहते हैं मां सीता ने अपने जीवन में अनेक कष्ट उठाए और यह माना जाता है कि सीताजी के हरण के बाद उसी रात देवराज इंद्र, भगवान ब्रह्मा के कहने पर अशोक वाटिका में माता सीता के लिए खीर लेकर आ चुके हैं.

वहीं माता सीता को खीर अर्पित की, जिसके खाने से माता सीता को जब तक लंका में रहीं भूख-प्यास नहीं लगी और ऐसा भी माना जाता है कि माता सीता को महज 18 साल की आयु में वनवास का कष्ट भोगना पड़ा. कहते हैं वन गमन के दौरान माता सीता भगवान श्रीराम की छाया शक्ति रहीं और माता सीता अशोक वाटिका में वैराग्यणी के रूप में तप नहीं करतीं तो रावण को मार पाना असंभव हो जाता.

वहीं श्रीरामचरित मानस में लिखा गया है कि वनवास के दौरान श्रीराम के पीछे-पीछे सीता चलती थीं चलते समय वह इस बात का विशेष ध्यान रखती थीं कि भूल से भी उनका पैर श्रीराम के चरण चिह्नों पर न रख जाए क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था.

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