तमिल विद्रोही युद्ध अपराध मसला - श्रीलंकाई सैनिक मुश्किल में घिरे

कोलंबो : श्रीलंका में इन दिनों तमिल विद्रोहियों के विरूद्ध युद्ध के अंतिम चरण में किए गए युद्ध अपराधों को लेकर वाद गहरा रहा है। जिसमें यह बात सामने आई है कि सरकार की ओर से गठित जांच आयोग द्वारा श्रीलंकाई सेना के युद्ध अपराधों को अंजाम देने के आरोपों को विश्वसनीय कहा गया है। इस दौरान यह भी कहा गया कि सरकारी जांच आयोग द्वारा घरेलू जांच के दौरान विदेशी न्यायाधीशों की भूमिका से जुड़े संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की सिफारिश का समर्थन कर दिया गया है।

इस दौरान पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने 178 पन्नों की रिपोर्ट गठित करते हुए कहा कि इस तरह का आरोप विश्वसनीय है। दरअसल विद्रोहियों के साथ किए गए युद्ध में अंतिम पायदानों पर सैनिकों ने कुछ कार्य ऐसे किए हैं जो युद्ध अपराधों की श्रेणी में आते हैं। इस मामले में यह बात भी सामने आई है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश मैक्सवेल परानागमा द्वारा युद्ध अपराधों के आरोपों की स्वाधीन न्यायिक जांच की मांग भी की गई। 

आयोग द्वारा श्रीलंकाई विधि तंत्र में युद्ध अपराधों को लेकर अलग से एक विभाग गठित करने का प्रस्ताव भी दिया। जिस पर  सिलसिलेवार तरीके से विचार करने की बात कही है। इस मामले में यह भी कहा गया है कि इस तरह की डाॅक्यूमेंट्री नो फायर जोन में दर्शाई गई है। जिसमें यह बात सामने आई है कि श्रीलंकाई सैनिकों ने तमिल कैदियों के साथ मारपीट की थी। इस डाॅक्यूमेंट्री के वीडियो फुटेज में काफी बातों का अवलोकन किया गया है। इस मसले पर परानागमा द्वारा कहा गया कि इस तरह के सबूत सामने रखे गए हें जिसमें कहा गया है कि चैनल फोर की जो डाॅक्यूमेंट्री सामने लाई गई है उसमें नाटकीयता भरी गई थी।

इस वीडियो में उकसाने वाली भाषा का उपयोग किया गया। सेना द्वारा पहले इस डाॅक्युमेंट्री को मनगढ़ंत बता दिया गया था। उल्लेखनीय है कि इस मामले में यूएनएचआरसी की रिपोर्ट का समर्थन किया गया। जिसमें कहा गया कि युद्ध अपराधों की जांच में विश्वसनीयता तय करने के ही साथ अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधीशों की भूमिका की सिफारिश भी की गई। इस मामले में कहा गया कि श्रीलंका की न्यायिक प्रक्रिया पर ऐसे मसले को लेकर विश्वास नहीं दर्शाया जा सकता है। 

 

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