सूरज की कड़ी धूप कभी सह न सका

िंदगी फिर मेरा जीना मेरे किस काम आया.
सिर्फ सहर ही नही रात हुई है बदनाम.
आपकी मस्त निगाहों पे भी इल्जाम आया.
फिर वो सूरज की कड़ी धूप कभी सह न सका.
जिसको जुल्फों की घनी छॉव मे आराम आया.
आज हर फूल को हम देख रहे है ऐसे
मेरे महबूब का खत़ जैसे मेरे नाम आया.
मौजे गंगा की तरह झूम उठी जिंदगी आयी बनारस का जहां नाम आया. **
आप की मस्त निगाहों पे भी इल्जाम आया.
तेरे बचने की घड़ी गर्दिशे अय्याम आया.
मुझसे हुशियार मेरे हाथ में अब जाम आया.
फिर वो सूरज की कड़ी धूप कभी सह न सका.

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