कुछ राज मेरे साथ ही दफन होने चाहिए : राष्ट्रपति

Jan 29 2016 10:18 AM
कुछ राज मेरे साथ ही दफन होने चाहिए : राष्ट्रपति

नई दिल्ली : देश के 13 वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन के अनुभवों को किताबों का रुप दिया है। किताब का नाम है "The Turbulent Years:1980-96"। इस किताब के दूसरे भाग में मुखर्जी ने कई खुलासे तो किए है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि कुछ तथ्य मेरे साथ ही दफन हो जाने चाहिए। हर बार की तरह इस बार राजनीतिक पृष्ठभूमि की किताब है, तो कुछ विवादित तथ्यों का होना लाजिमी है।

मुखर्जी ने किताब में देश के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के संबंध में कई बातें बताई है। उन्होने लिखा है कि जिस वक्त इंदिरा गांधी पर हत्यारों ने गोली बरसाई उस वक्त राजीव गांधी तत्कालीन वित मंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ एक रैली को संबोधित कर रहे थे। राजीव को वायरलेस पर सूचना मिली कि इंदिरा पर गोली चली है, वो तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेसियों ने राजीव को पीएम की कुर्सी संभालने को कहा तो राजीव ने मुखर्जी से पूछा क्या आपको लगता है, मैं सब संभाल लूंगा। मुखर्जी ने भी हौसला बढ़ाते हुए कहा हाँ, हम सब आपकी मदद के लिए होंगे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, रेल मंत्री ए.बी.ए. गनी खां चौधरी और लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने राजीव से अंतरिम व्यवस्था के बजाय पूर्णरूप से पीएम पद संभालने को कहा था।

मुखर्जी ने लिखा है कि मेरे काम-काज को मेरे निंदकों ने राजीव के सामने ऐसे पेश किया, जिससे उन्हें लगे कि मुझे उनका नेतृत्व पसंद नही है। राजीव दूसरों के प्रभाव में थे। उन तक चुगली की हुई बातें पहुंचती थी, ऐसे में मेरे धैर्य पर मेरी निराशा हावी हो गई। मुखर्जी ने लिखा है कि जब मैंने दो साल बाद कांग्रेस में वापसी की तो मुझे पता चला कि राजीव ने तो मेरे निलंबन पर कभी हस्ताक्षर ही नही किया।

अपने पीएम बनने संबंधी अफवाहों के बारे में मुखर्जी ने लिखा कि कई बार ऐसी अफवाहें उड़ी है कि मैं कार्यवाहक पीएम बनना चाहता हूँ और मैंने अपना दावा पेश किया था। यह गलत है। इंदिरा गांधी की मृत्यु से पहले आपातकाल के बाद हुए आम चुनावों में संजय गांधी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने देशव्यापी प्रचार अभियान शुरू किया था। उन्होंने पार्टी की कार्यप्रणाली और राज्य इकाइयों में काफी बदलाव किए थे।

जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी थी, वहां उन्‍हीं लोगों को मुख्यमंत्री पद सौंपा गया, जिन्होंने बुरे समय में इंदिरा गांधी का साथ दिया था। संजय गांधी की शवयात्रा के दौरान इंदिरा गांधी चाहती थीं कि मेनका गांधी उस ट्रक में शव के पास बैठें, जिस पर अंतिम यात्रा निकल रही थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजीव गांधी के इटली से लौटने पर इंदिरा गांधी ने कहा था कि अब तुम मेरी आखिरी उम्मीद हो।

तब राजीव ने कहा था, 'मैं राजनीतिक आदमी नहीं हूं। बाद में उन्होंने कहा कि यदि मेरे राजनीति में आने से मां को मदद मिलेगी तो मैं ऐसा करने के लिए तैयार हूं। आपातकाल के बाद संजय गांधी की छवि को खलनायक जैसा बनाया गया। जबकि वो देश की आबादी को नियंत्रित करना चाहते थे। 1992 में हुए बाबरी विध्वंस का कारण मुखर्जी ने पूरी तरहपूर्व पीएम पी वी नरसिम्हा राव को बताया है।