कैलाश पर्वत उठाने वाला रावण इस वजह से नहीं तोड़ पाया था शिव धनुष

Nov 11 2019 04:40 PM
कैलाश पर्वत उठाने वाला रावण इस वजह से नहीं तोड़ पाया था शिव धनुष

बहुत से लोगों के मन में यह सवाल आता है कि जब रावण कैलाश पर्वत उठा सकता है तो शिव का धनुष कैसे नहीं उठा पाया और भगवान राम ने कैसे उस धनुष को उठाकर तोड़ दिया? अगर आपके मन में भी यह सवाल है तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि आखिर क्यों नहीं धनुष उठा पाया था रावण.

ऐसा था धनुष : आपको बता दें कि भगवान शिव का धनुष बहुत ही शक्तिशाली और चमत्कारिक था और शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे. वहीं उस समय ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो. वह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था और इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था. इसी के साथ इस धनुष का नाम पिनाक था और देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवराज इन्द्र को सौंप दिया गया था. कहा जाता है देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवराज को दे दिया और राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवराज थे,. वहीं शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था और उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था, लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया. तो अब आइए जानते हैं कि रावण क्यों नहीं उठा पाया धनुष.

श्रीराम चरितमानस में एक चौपाई आती है:- "उठहु राम भंजहु भव चापा, मेटहु तात जनक परितापाI"

भावार्थ- गुरु विश्वामित्र जनकजी को बेहद परेशान और निराश देखकर श्री रामजी से कहते हैं कि हे पुत्र श्रीराम उठो और "भव सागर रुपी" इस धनुष को तोड़कर, जनक की पीड़ा का हरण करो."

इस चौपाई में एक शब्द है 'भव चापा' इसका मतलब है इस धनुष को उठाने के लिए शक्ति की नहीं बल्कि प्रेम और निरंकार की जरूरत थी. जी हाँ, वह मायावी और दिव्य धनुष था और उसे उठाने के लिए दैवीय गुणों की जरूरत थी कोई अहंकारी उसे नहीं उठा सकता था. आप जानते ही हैं रावण एक अहंकारी मनुष्‍य था और वह कैलाश पर्वत तो उठा सकता था लेकिन धनुष नहीं. कहा जाता है रावण जितनी बार उस धनुष में शक्ति लगाता वह धनुष और भारी हो जाता था और सभी राजा अपनी शक्ति और अहंकार से हारे थे इस कारण कोई धनुष नहीं उठा पाया.

वहीं जब प्रभु श्रीराम की बारी आई तो उन्होंने सबसे पहले उन्हों धनुष को प्रणाम किया और उसके बाद उन्होंने धनुष की परिक्रमा की और उसे संपूर्ण सम्मान दिया. ऐसा करने के बाद उन्होंने धनुष को प्रेम पूर्वक उठाया और उसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और जैसे ही उन्होंने उसे झुकाया धनुष खुद ही टूट गया.

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