नरभक्षक राक्षस को श्रीराम ने गाड़ दिया था जिन्दा, प्रसंग सुनकर हैरान रह जाएंगे आप

Feb 05 2019 09:00 PM
नरभक्षक राक्षस को श्रीराम ने गाड़ दिया था जिन्दा, प्रसंग सुनकर हैरान रह जाएंगे आप

राम भगवान से जुडी कई कथाए हैं जो बहुत पुरानी है और रोमांच से भर देने वाली हैं. ऐसे में क्या आप जानते हैं कि प्रभु श्रीराम ने एक राक्षस को जिंदा गाड़ दिया था. जी हाँ, लेकिन क्यों यह बहुत कम लोग जानते हैं. ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं इससे जुडी उस कथा के बारे में जिसे सुनने के बाद आप हैरान रह जाएंगे. आइए जानते हैं वह कथा.

कथा - विराध दंडकवन का राक्षस था. सीता और लक्ष्मण के साथ राम ने दंडक वन में प्रवेश किया. वहां पर उन्हें ऋषि-मुनियों के अनेक आश्रम दृष्टिगत हुए. राम उन्हीं के आश्रम में रहने लगे. ऋषियों ने उन्हें एक राक्षस के उत्पात की जानकारी दी. राम ने उन्हें निर्भीक किया. वहां से उन्होंने महावन में प्रवेश किया, जहां नाना प्रकार के हिंसक पशु और नरभक्षक राक्षस निवास करते थे. ये नरभक्षक राक्षस ही तपस्वियों को कष्ट दिया करते थे. कुछ ही दूर जाने के बाद बाघम्बर धारण किए हुए एक पर्वताकार राक्षस दृष्टिगत हुआ. वह राक्षस हाथी के समान चिंघाड़ता हुआ सीता पर झपटा.

उसने सीता को उठा लिया और कुछ दूर जाकर खड़ा हो गया. उसने राम और लक्ष्मण पर क्रोधित होते हुए कहा- तुम धनुष-बाण लेकर दंडक वन में घुस आए हो. तुम दोनों कौन हो? क्या तुमने मेरा नाम नहीं सुना? मैं प्रतिदिन ऋषियों का मांस खाकर अपनी क्षुधा शांत करने वाला विराध हूं. तुम्हारी मृत्यु ही तुम्हें यहां ले आई है. मैं तुम दोनों का अभी रक्तपान करके इस सुन्दर स्त्री को अपनी पत्नी बनाऊंगा. विराध ने हंसते हुए कहा- यदि तुम मेरा परिचय जानना ही चाहते हो तो सुनो! मैं जय राक्षस का पुत्र हूं. मेरी माता का नाम शतह्रदा है. मुझे ब्रह्माजी से यह वर प्राप्त है कि किसी भी प्रकार का अस्त्र-शस्त्र न तो मेरी हत्या ही कर सकती है और न ही उनसे मेरे अंग छिन्न-भिन्न हो सकते हैं. यदि तुम इस स्त्री को मेरे पास छोड़कर चले जाओगे तो मैं तुम्हें वचन देता हूं कि मैं तुम्हें नहीं मारूंगा. राम और लक्ष्मण ने उससे घोर युद्ध किया और उसे हर तरह से घायल कर दिया.

फिर उसकी भुजाएं भी काट दीं.तभी राम बोले- लक्ष्मण! वरदान के कारण यह दुष्ट मर नहीं सकता इसलिए यही उचित है कि हमें भूमि में गड्ढा खोदकर इसे बहुत गहराई में गाड़ देना चाहिए. लक्ष्मण गड्ढा खोदने लगे और राम विराध की गर्दन पर पैर रखकर खड़े हो गए. तब विराध बोला- हे प्रभु! मैं तुम्बुरू नाम का गंधर्व हूं. कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था. मैं शाप के कारण राक्षस हो गया था. आज आपकी कृपा से मुझे उस शाप से मुक्ति मिल रही है.

राम और लक्ष्मण ने उसे उठाकर गड्ढे में डाल दिया और गड्ढे को पत्थर आदि से पाट दिया. एक अन्य कथा के अनुसार श्रीराम व लक्ष्मण द्वारा कुचले जाने पर हताहत होकर इस राक्षस ने कहा- अवटे चापि मां राम प्रक्षिप्य कुशली व्रज. रक्षसां गतसत्वानामेष धर्म: सनातन:॥ अर्थात, "हे राम! आप मुझे गड्डे में दबा कर चले जाइए, क्योंकि मरे हुये राक्षसों को जमीन में गाढ़ना पुरातन प्रथा है.'

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