श्राद्ध की श्रद्धा से मिलती है पितरों के आशीर्वाद की छाया

पौराणिक मान्यता के अनुसार पितरों को स्मरण करने और उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान और पूजन करने से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है। पितर प्रसन्न होकर व्यक्ति को वह सब देते हैं जिसकी उसे कामना होती है। उसे संतान, धन-धान्य से संपन्नता आदि प्रदान करते हैं। माना जाता है कि देह से मुक्त होने के बाद जीवात्मा को पिंड दान कर आगे की गति का कार्य किया जाता है। इस तरह से श्राद्धकर्म कर उनकी परमगति की कामना की जाती है और पितृऋण से मुक्त हुआ जाता है। आज से देश भर में श्राद्ध पक्ष का प्रारंभ हो गया।

यूं तो श्राद्ध पक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से अर्थात रविवार को अनंत चतुर्दशी समाप्त होने के बाद श्राद्ध पक्ष की शुरूआत मानी गई। मगर अधिकांश लोगों द्वारा आज से ही श्राद्ध कर्म प्रारंभ किए गए। इस दौरान लोगों ने पवित्र तीर्थों और श्राद्ध कर्म स्थलों पर जाकर व घरों में अपने पितरों के निमित्त पूजन किया और फिर दान आदि कार्य किया।  इसके बाद ब्राह्मण भोज भी दिया गया। 

मंगलवार से सर्वपितृ अमावस्या तक श्राद्ध कर्म किए जाऐंगे। यही नहीं श्राद्ध से जुड़ी मान्यता के अंतर्गत यह कहा गया है कि बिहार के गया में किए  गए श्राद्ध, मध्यप्रदेश के उज्जैन के सिद्धवट में किए गए श्राद्ध और प्रयाग में किए गए श्राद्ध का बहुत महत्व है। माना जाता है कि यहां किए गए श्राद्ध से पितरों की परम गति होती है और श्राद्ध करने वाले को अक्षय पुण्य मिलता है। यही नहीं उज्जैन का सिद्धवट वह क्षेत्र हैं

जहां मोक्षदायिनी शिप्रा नदी में माता पार्वती ने अपने हाथों से वट वृक्ष लगाया था। यह वटवृक्ष कभी भी नष्ट न होने वाला माना जाता है। इस तीर्थ क्षेत्र में पितरों के निमित्त पिंडदान, नारायण बलि पूजन, तर्पण करना बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। विश्व में यह स्थल नारायण बलि और नागबलि पूजन के लिए बेहद दुर्लभ है। 

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