शरद पूर्णिमा के दिन ही श्रीकृष्ण ने गोपियों संग किया था महारास, 6 महीने तक नहीं हुई थी सुबह

आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के तौर पर जाना जाता है। मगर ब्रज क्षेत्र में शरद पूर्णिमा के दिन को रास पूर्णिमा भी बोला जाता है। परम्परा है कि द्वापरयुग में शरद पूर्णिमा की रात को ही राधारानी एवं गोपियों संग ​मिलकर महारास किया था। पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की धवल चांदनी में महारास का वो नजारा इतना खूबसूरत था कि प्रकृति भी उसे निहारने के लिए वहां रुक गई थी। 6 माह तक महादेव खुद गोपी का रूप धारण करके इस रास को देखने के लिए वहां पहुंचे थे तथा चंद्रदेव इतने मंत्रमुग्ध हो गए थे कि 6 महीने तक सुबह नहीं हुई थी। आज शरद पूर्णिमा के इस मौके पर आप भी जानिए श्रीकृष्ण के महारास का ये दिलचस्प किस्सा।

गोवर्धन पर्वत के समीप बसे परसौली गांव में श्रीकृष्ण ने अपनी गोपियों संग महारास रचाया था। कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात को इस जगह पर जैसे ही श्रीकृष्ण ने मुरली की मधुर धुन बजाना आरम्भ की, ब्रज की गोपियां बेसुध होकर कृष्ण प्रेम में वहां दौड़ी चली आईं। प्रत्येक गोपी श्रीकृष्ण के साथ नृत्य करना चाहती थी। इस महारास में गोपियों की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण ने कई रूप धारण किए तथा प्रत्येक गोपी के साथ रास किया। महारास के चलते प्रत्येक ओर प्रत्येक गोपी के साथ श्रीकृष्ण ही दिखाई दे रहे थे। ये दृश्य इतना खूबसूरत था कि देवता भी इस नजारे का आनंद लेने के लिए व्याकुल हो उठे थे।

महादेव नारायण के भक्त हैं। वे भी अपने आराध्य का महारास देखने के लिए इसमें सम्मिलित होने के लिए अधीर हो रहे थे। किन्तु उन्हें गोपियों ने ये कहकर रोक दिया कि इस महारास में श्रीकृष्ण के साथ केवल गोपियां ही आ सकती हैं। तत्पश्चात अपने आराध्य के इस अद्भुत पल का साक्षी बनने के लिए महादेव ने गोपी का रूप धारण किया था तथा महारास में सम्मिलित हुए थे। शिव जी का ये रूप गोपेश्वर महादेव के नाम से प्रचलित हुआ। वृंदावन में आज भी महादेव का ये मंदिर उपस्थित है। यहां महादेव का सोलह श्रृंगार किया जाता है।

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