हिंदी दिवस: मातृभाषा हिंदी के लिए 'नेहरू' से भी लड़ गए थे सेठ गोविंददास, लौटा दिया था पद्मभूषण सम्मान

इंदौर: मध्य प्रदेश का जबलपुर हिन्दी के लिए हमेशा से आवाज बुलंद करता रहा है। हिन्दी के लिए जबलपुर के प्रथम सांसद सेठ गोविंददास संसद में उस समय के पीएम जवाहरलाल नेहरू तक से भिड़ गए थे। यहां तक कि सेठ गोविंददास ने उन्हें 1961 में मिला पद्मभूषण सम्मान तक लौटा दिया था। हिन्दी के सवाल पर उन्होंने अपनी पार्टी कांग्रेस की नीति से अलग जाकर संसद में हिन्दी का पुरजोर तरीके से समर्थन किया था। उच्च न्यायालय में हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने की पहली आवाज भी जबलपुर से उठी थी। 1990 में पहली बार उच्च न्यायालय में हिन्दी में फैसला सुनाया गया। भारतेंदु हरीशचंद्र, बाबू पुरुषोत्तमदास टंडन के साथ ही सेठ गोविंददास ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिन्दी के लिए समर्पित कर दिया था। 

जबलपुर के प्रथम सांसद रहे साहित्यकार सेठ गोविंददास देश और हिन्दी में अंग्रेजी भाषा के मिश्रण का पुरजोर विरोध करते थे। क्षेत्रीय भाषाओं को विभिन्न राज्यों की शासकीय भाषा का अधिकार देने के प्रस्ताव पर हुई बहस के दौरान संसद में दिया गया सेठ गोविंददास का भाषण आज भी हिन्दी के विकास में मील का पत्थर माना जाता है। संसद में सेठ गोविंददास ने कहा था कि, 'जिस भाषा ने स्वाधीनता संग्राम में समूचे देश को एकसूत्र में पिरो दिया था, उसे कमजोर नहीं माना जा सकता। अंग्रेजी की वर्णमाला, हिन्दी की वर्णमाला की आधी भी नहीं है। हिन्दी का उद्गम संस्कृत भाषा से हुआ है, भारत में प्रचलित तमाम भाषाओं की जननी संस्कृत ही है। एक मां से उत्पन्न बच्चों में अधिक तालमेल होगा या अलग-अलग माताओं के बच्चों में? यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के एक तिहाई से अधिक लोगों की भाषा को अपने ही देश में राजभाषा का दर्जा हासिल करने के लिए याचना करना पड़ रहा है।' 

1962 में कांग्रेस ने संसद में एक विधेयक पेश किया था। इस विधेयक के तहत अंग्रेजी को राजकीय भाषा घोषित करने और राज्यों को अपनी क्षेत्रीय भाषाओं को भी दूसरी राजकीय भाषा बनाने का अधिकार दिया जाना था। तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू से सहमति न बन पाने के बाद भी सेठ गोविंददास ने इसे अपना जनतांत्रिक अधिकार बताते हुए अपनी राय रखने की अनुमति मांगी। उस समय नेहरू को भी सेठ गोविंददास की जिद के आगे झुक कर उन्हें विरोध दर्ज कराने की इजाजत देनी पड़ी थी। संसद में संविधान के अनुच्छेद 343 में प्रस्तावित इस संशोधन के खिलाफ वोट करने वाले वे एकमात्र सांसद थे। हिन्दी के प्रति समर्पित सेठ गोविंदास ने 1946 में संविधान सभा की प्रथम बैठक में भी अपनी बात पूरी ताकत से रखी थी। 14 जुलाई, 1947 को संविधान सभा की चौथी बैठक में सेठ गोविंददास और पीडी टंडन खुलकर हिन्दी के समर्थन में उतर आए। सेठ गोविंददास की तरफ से राष्ट्रीय राजधानीं दिल्ली में 6-7 अगस्त 1949 को एक राष्ट्रभाषा सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया। कोशिश की गई कि राजभाषा के सवाल पर आम सहमति बन जाए पर लिपि के प्रश्न पर पेंच फंस गया, क्योंकि कुछ लोग अरबी लिपि को और कुछ लोग रोमन लिपि को अपनाने की सलाह दे रहे थे। हालांकि, बहुमत हिन्दी के पक्ष में था, फिर भी कुछ सदस्य राष्ट्रीय एकता के परिप्रेक्ष्य में हिन्दुस्तानी (अंग्रेजी) के पक्षधर थे। 12 सितंबर 1949 को भाषा के सवाल पर विचार करने के लिए संविधान सभा की मीटिंग में हिन्दी को राजभाषा के रूप में अपनाए जाने के पक्ष में आम सहमति बन गई, हालांकि अंकों की लिपि और अंग्रेजी को जारी रहने के लिए कितना वक़्त दिया जाए इस पर सहमति नहीं बन पाई। 

1990 में हाई कोर्ट ने पहली बार हिंदी में दिया फैसला :-

1990 में उच्च न्यायालय ने हिन्दी में दाखिल याचिकाओं पर हिन्दी में ही फैसले भी सुनाए। पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) शिवदयाल, न्यायमूर्ति आरसी मिश्रा व न्यायमूर्ति गुलाब गुप्ता ने सिंगल बेंच में बैठते हुए हिन्दी में कई फैसले सुनाए। अब 2008 के बाद से उच्च न्यायालय की तीनों खंडपीठों में अब वकीलों को हिन्दी में जिरह करने की छूट है। बम्बादेवी मंदिर के पास रहने वाले बुजुर्ग वकील शीतला प्रसाद त्रिपाठी ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में हिन्दी में कामकाज की मांग को राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप दिया। 1990 में सबकी सहमति से हिन्दी को उच्च न्यायालय की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए जनहित याचिका दाखिल की गई। संविधान में दिए गए प्रावधानों का हवाला दिया गया। अंतत: न्यायालय ने याचिका का निराकरण करते हुए राष्ट्रपति और गवर्नर को इस संबंध में अभ्यावेदन देने के लिए कहा। अंतत: 2008 में हाईकोर्ट ने भी नियमों में बदलाव किया। संशोधित मप्र हाईकोर्ट रूल्स एंड ऑर्डर 2008 में हिन्दी भाषा को अंगीकार कर लिया गया। हिन्दी में याचिका दाखिल करने, बहस करने की इजाजत मिली।

हिंदी के लिए लौटा दिया था पद्मभूषण:-

16 अक्तूबर 1896 को जबलपुर के समृद्ध माहेश्वरी परिवार में सेठ गोविंददास का जन्म हुआ था। 1923 में 26-27 वर्ष की आयु में ही केंद्रीय सभा के लिए चुने गए। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सभी आंदोलनों में शामिल हुए, कई बार जेल भी गए। सरकार से बगावत की वजह से उन्हें पैतृक संपत्ति से उत्तराधिकार भी गंवाना पड़ा था। आजादी के बाद 1947 से 1974 तक वह जबलपुर संसदीय सीट से सांसद रहे। 1961 में भारत के तीसरे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से नवाज़ा गया था। 1961 को उन्होंने हिंदी भाषा के लिए अधिकार की लड़ाई लड़ते हुए पद्मभूषण सम्मान को लौटा दिया था।

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