सेविंग करना है बहुत जरूरी, इन तरीकों को अपनाकर होगी बचत

हर किसी के लिए बचत करना बहुत बड़ी बात नहीं है. लेकिन बचत का प्रबंधन करना बहुत बड़ी बात है. इसकी मुख्य वजह यह है कि कमा रहे दिनों में बचत के प्रबंधन में जो भी थोड़ी-बहुत ऊंच-नीच होती या की जाती है, उसका सीधा असर रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी पर दिखता है. लेकिन बहुत सधे बचतकर्ता निवेशक भी अक्सर यह मान बैठते हैं कि पूरी बचत किसी सुरक्षित असेट क्लास में लगा दे तो रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी आराम से कट जाएगी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता, क्योंकि आपकी मुद्रा यानी रुपये का चढ़ता-गिरता भाव आपकी गाढ़ी कमाई को भी चट करता रहता है. ऐसे में आपके पास एक ही विकल्प बचता है कि निवेश की रकम कम से कम इतनी हो कि उससे हासिल कमाई महंगाई दर को पछाड़ते हुए भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो.   

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि आमतौर पर मैं बचत और निवेश से जुड़े टॉपिक पर बहुत से सवालों का जवाब देता हूं. लेकिन रिटायरमेंट प्लानिंग पर पूछे गए सवाल मुझे सबसे ज्यादा चिंतित करते हैं. मुख्य रूप से वे सवाल जो रिटायरमेंट के बाद निवेश के प्रबंधन और इनकम हासिल करने के बारे में होते हैं. वास्तव में जब उम्रदराज लोग रिटायरमेंट के बाद इनकम पर सवाल पूछते हैं तो मैं एक तरह का डर महसूस करता हूं. इसकी वजह यह है कि जब आप युवा होते हैं और कमा रहे होते हैं तो आप बचत से जुड़ी गलतियों को थोड़े धैर्य के साथ संभाल सकते हैं. ऐसा होने पर हो सकता है कि आपको थोड़ी असुविधा का सामना करना पड़े. 

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इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों के लिए कभी-कभी बुरे हालात को टालना मुश्किल हो जाता है. इन समस्याओं की एक अहम वजह एक भरोसा है. भरोसा यह कि रिटायरमेंट सेविंग में सबसे अहम चीज यह है कि पूरी रकम किसी सुरक्षित असेट क्लास में निवेश की जानी चाहिए. और यह सुरक्षित असेट क्लास जरूरी तौर पर एक या दूसरे तरह की फिक्स्ड इनकम डिपॉजिट होनी चाहिए. लेकिन यह सच नहीं है. यहां तक कि जिन लोगों के पास बचत के तौर पर बड़ी रकम होती है उनके लिए भी भारत में रिटायरमेंट प्लानिंग की अहम समस्या महंगाई के लिए भरपाई करने की है. अगर भारत में महंगाई की दर दो या तीन फीसद होती तो समस्या नहीं आती. लेकिन वास्तविकता यह है कि रुपये की घटती खरीद क्षमता हमारी बचत को तेजी से खा रही है.

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