अनमोल है व्याघ्रराज का जीवन

टीवी पर न्यूज़ देख रहे कुछ लोग सहम उठे उनके आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा। दरअसल टीवी पर मुंबई के सीमावर्ती क्षेत्र में बाघ को यहां वहां भागते और एक पेड़ पर चढ़ते हुए दिखाया गया था। बाघ के अचानक शहर में दाखिल होने की बात सभी को आश्चर्य में डाल रही थी तो इस इलाके से सटी बस्तियों के लोग बाघ को मारने के लिए दौड़ रहे थे ऐसे में बाघ आतंकित होकर यहां वहां भाग रहा था। 

यही नहीं दक्षिण भारत के अभ्यारण्य से ऐसा ही कुछ समाचार सामने आया। दरअसल इस अभ्यारण्य से शेर निकलकर वन विभाग के कर्मचारियों के क्वार्टर की ओर पहुंच गए और उन्होंने कर्मचारियों और उनके  बच्चों पर हमला भी किया। उपर्युक्त वर्णित ये वाकये हकीकत की बानगी हैं। वास्तविक जीवन में भी ऐसी कुछ घटनाऐं हुई हैं। जब जानवर जंगल की सीमाओं को तोड़कर रिहायशी इलाकों में पहुंच गए। दरअसल बढ़ते नगरीकरण, जंगलों के सिमटने से पर्यावरणीय परिवर्तनों और ऐसे अन्य कारणों के चलते वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में है। इन वन्य जीवों में पेंथरा टाईग्रिस यानि जंगल का राजा शेर भी शामिल है। वह शेर जिसकी एक दहाड़ से डाल पर बैठे पंछी उड़कर अन्यत्र जाने लगते हैं और हिरण कुलांचे मारकर सुरक्षित स्थान की टोह लेता है। 

जंगल का यह राजा अब कम ही देखने को मिलता है। समय के साथ बढ़ते शिकार बाघ के अंगों की तस्करी बाघ की खाल की तस्करी और पर्यावरणीय असंतुलन के कारण बाघ विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए लेकिन जब भारत में बाघों को संरक्षित करने पर विचार किया गया तो बाघों के संरक्षण के लिए टाईगर रिज़र्व नेशनल पार्क और अभ्यारण्य के साथ चिडि़याघरों में भी विशेष व्यवस्थाऐं की गईं। 

जिसके बाद बाघों की तादाद में कुछ इज़ाफा हुआ और इस दौरान वर्ष 2014 में बाघों की गणना करबी 2226 तक पहुंच गई। बाघों की गणना उनके क्षेत्र मल और निशान के आधार पर की जाती है। स्वतंत्रता के पहले अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर बाघों का शिकार किया। इस दौरान बीसवीं सदी में भारत में 35000 से भी अधिक बाघों को मारा गया। बाघों को औषधिय उपयोग के लिए किया जाता रहा है जिसके कारण भी इनका शिकार होता है। वर्ष 2010 में बाघ की संख्या 170 तक पहुंच गई। 

मगर अब बाघों की संख्या में इजाफा होने से बाघों के जीवन के संरक्षण की यह स्थिति संतोषजनक मानी जा रही है। मगर बीते कुछ वर्षों में मौसम की प्रतिकूलता के कारण बाघों के मरने की घटनाओं ने गंभीर संकेत दिए और इस दिशा में पहल की गई कि बाघों के जीवन को संरक्षित रखा जाए। आज भी बाघ मानव के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। बच्चों में बाघों को लेकर विशेष कौतूहल बना रहता है। तो दूसरी ओर बाघ पारिस्थितिकी संतुलन के लिए बेहद आवश्यक होते हैं। 

दरअसल बाघ स्वयं तो शिकार करता ही है साथ ही वह शेर तेंदुए द्वारा छोड़े गए शिकार को भी भोजन के तौर पर ले जाता है यही नहीं बाघ स्वयं द्वारा किए गए शिकार का भक्षण करने के बाद बचा हुआ मांस बाकि के दिनों के लिए लेजाता है कई बार यह सड़ा हुआ मांस भी खा लेता है और अपने बचाव के लिए कई बार यह पेड़ों पर भी चढ़ जाता है। बाघ मोर हिरण आदि का शिकार करता है। बढ़े बाघ और बच्चे वाली मादा बाघिन के लिए मानव सबसे आसान शिकार होता है। यूं तो हमारे देश में कई ऋषि मुनि और संत बाघों से प्रेम रखते रहे हैं और जंगलों में स्थित अपने आश्रमों में बाघों को पाल कर रखते रहे हैं।

देश में अति प्राचीन समय में हुए राजा भरत को बचपन में शेर के दांत गिनते हुए दर्शाया जाता है। इससे ज़ाहिर होता है किदेश में बहुत पहले से ही बाघों और शेरों के संरक्षण की बातें चली आ रही हैं। मगर नेपाल के एक बौद्ध मठ में रहने वाले बौद्ध भिक्षु आज भी बाघों को पालकर रखते हैं। यह इन बौद्ध भिक्षुओं की दयालुता का प्रमाण तो है ही साथ ही वे पर्यावरण संरक्षण का अहम कार्य भी कर रहे हैं।

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