आखिर क्या है भारत और नेपाल के रिश्तों की गहराई

आखिर क्या है भारत और नेपाल के रिश्तों की गहराई

नेपाल में राज करने वालों का इतिहास सदैव से ही मोल-तोल वाला रहा है. बेहतर मोलभाव के लिए यहां के शासकों को का नाम गिना जाता है. इन्हें मालूम है कि कब दबाव बढ़ाना और किसी समय दाम वसूल करना है. ऐसा ये प्राचीनकाल से करते हैं और इसी नाते इनके संबंध ब्रिटिश हुकुमत से लेकर चीन और पाकिस्तान की सरकारों से भी बेहतर रहे हैं. नेपाल की कुल आबादी का 51 प्रतिशत हिस्सा मधेशियों का है जो नेपाल के बिहार और उत्तर प्रदेश से सटे तराई इलाके में रहते हैं. इसमें महज चार प्रतिशत मुस्लिम, जबकि शेष सभी हिंदू है.

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यह बात हर किसी को नही पता है कि पहाड़ों में नेपाल की 49 प्रतिशत आबादी रहती है. यहीं के लोग वर्ष 1768 के बाद से देश में शासन कर रहे हैं. भारत नेपाल संबंध अनादि काल से है. इसे समय और सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है. इसे किसी राज्य व्यवस्था द्वारा भूमि पर किए गए सीमांकन या जारी नक्शे द्वारा भी नहीं सुलझाया जा सकता है.

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आपकी जानकारी के लिए बता दे कि जहां पर आज के दौर में नेपाल और बिहार जैसे भारतीय राज्य स्थित हैं, वहां पर कभी निमी, मिथि और जनक जैसे राज्य हुआ करते थे. इन्हीं निमि से नेपाल और मिथि से मिथिला की तर्ज पर नेपाल की पावन भूमि का नाम रखा गया. जिसका विस्तार हिमालय के उत्तंग शिखरों से गंगा के किनारों तक था. कभी यहां कर्नाट राजवंश ने वर्ष 1097 से 1326 तक राज किया था. इस साम्राज्य के पतनोपरांत दक्षिण में ओइनवारों ने तो उत्तर के काठमांडू में क्षत्रिय मल्ल राजाओं ने राज किया था. यह मल्ल प्राचीन भारत की शासक जाति है. फिर दक्षिण में बेतिया और दरभंगा जैसे नए राज्य ने तो वहीं उत्तर के पहाड़ों में गोरखा राज ने मूर्तरूप लिया था. इस दौर में यहां सत्ता के दो केंद्र थे. उत्तर में काष्ठमंडप यानी काठमांडू और दक्षिण में कभी विशाला अर्थात वैशाली तथा विदेह नगरी यानी जनकपुर. इसी दौर में बेतिया राजा के उत्तराधिकारी ने ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभाव को लेकर वर्ष 1766 में बगावत कर दिया था.

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