RAW मूवी रिव्यु : हिंदुस्तानी जासूस की कहानी रॉ, जॉन के दिखे अलग रूप

फिल्म : RAW (रोमियो, अकबर, वॉटर)
कलाकार : जॉन अब्राहम, मौनी रॉय, सिकंदर खेर, सुचित्रा कृष्णामूर्ति, जैकी श्रॉफ 
निर्देशक : रॉबी ग्रेवाल 
मूवी टाइप : थ्रिलर,ऐक्शन
अवधि : 1 घंटा 52 मिनट
रेटिंग : 3/5

कलाकार और फिल्मकार के रूप में जॉन अब्राहम का जबरदस्त ट्रांसफॉर्मेशन हुआ है और यह रूपांतरण उनकी 'विकी डोनर', 'मद्रास कैफे' और पिछली फिल्म 'परमाणु' में देखने को मिला. इस बार रॉ अर्थात 'रोमियो अकबर वॉल्टर' के जरिए एक बार फिर वे देशभक्ति की बात करते हैं. वह 1971 के दौर में जॉन रोमियो, अकबर और वॉल्टर जैसे तीन ऐसे बहुरूप को जीते हैं, जो दुश्मन देश में जाकर देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाकर जासूसी करता है.  

कहानी 
अकबर (जॉन अब्राहम) से शुरू होती है, जिसे पाकिस्तानी इंटेलिजेंस अफसर खुदाबख्श (सिकंदर खेर) के हाथों खूब टॉर्चर किया जा चुका है. थर्ड डिग्री का इस्तेमाल करके उसके नाखून तक उखाड़ दिए गए हैं. पाकिस्तान इंटेलिजेंस को अकबर के भारतीय रॉ के जासूस होने का शक है. वहां से कहानी फ्लैशबैक में ट्रैवल करती है. बैंक में काम करनेवाला रोमियो ईमानदार और बहादुर है. वह बैंक में काम करने वाली श्रद्धा (मौनी रॉय) से प्यार करता है. वह अपनी मां के साथ रहता है. एक समय उसके पिता ने देश के लिए अपनी जान गंवाई थी और उसके बाद उसकी मां ने देशभक्ति के जुनून से दूर एक आम जिंदगी में उसकी परवरिश की थी, मगर बैंक में होनेवाली डकैती उनकी जिंदगी बदलकर रख देती है. यही से शुरू होती है इसकी खास कहानी. 

बैंक में हुई रॉबरी का वह जांबाजी से मुकाबला करता है. उस रॉबरी के बाद रोमियो को बताया जाता है कि उसे रॉ के चीफ श्रीकांत राय (जैकी श्रॉफ) द्वारा रॉ के एक जासूस के रूप में चुना गया है और अब उसे अकबर मलिक बनकर पाकिस्तान से खुफिया जानकारी जुटानी है. जासूस के रूप में उसे कड़ी ट्रेनिंग जी जाती है. पाकिस्तान आकर वह इजहाक अफरीदी (अनिल जॉर्ज) का दिल जीतता है और और कुछ ही समय में उसका विश्वासपात्र बन जाता है. वह भारत को पाकितान द्वारा बदलीपुर में होनेवाले हमले की योजना की जानकारी देता है. इस खुफिया मिशन पर उनके साथ क्या क्या hota है तो देखिये फिल्म.

फिल्म की खासियतें 
खलीज टाइम्स के अनुसार, फिल्म 'रॉ' की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें जॉन अब्राहम की बॉडी और एक्शन इमेज का फालतू इस्तेमाल नहीं किया गया है. फिल्म में जॉन अब्राहम के किरदार को बहुत ही साधारण रखा गया है और फालतू के एक्शन सीक्वेंस रॉ में नहीं ड़ाले गए हैं. इससे दर्शकों को सीन्स ज्यादा विश्वसनीय लगते हैं.

फिल्म की खामियां
जॉन अब्राहम की फिल्म की खामी बताते हुए रिव्यू में लिखा गया है कि, इसके सीन्स दर्शकों को लगातार उत्साहित नहीं रख पाते हैं. जब आप कोई सस्पेंस थ्रिलर बनाते हैं तो दर्शकों को हर सीन के बाद यह इंतजार रहना चाहिए कि अब मुख्य किरदार क्या करेगा ? लेकिन रॉ में ऐसा नहीं होता है. फिल्म के सीन्स इतने कमाल के नहीं हैं कि दर्शक सीट से उछल पड़ें या फिर चौंक जाएं.

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