क्यों बाँटा गया है रमज़ान को तीन अशरों में

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जैसे आजकल सभी लोग दिन और तारिख ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से देखकर चलते हैं, वैसे ही मुस्लमान हिजरी कैलेंडर के अनुसार चलते हैं. इस कैलेंडर का नौवा महीना रमज़ान होता है, जिसे अरबी भाषा में रमदान कहते हैं. पूरी दुनिया में फैले सभी मुस्लिम भाइयों के लिए रमज़ान का पाक महीना एक बड़ा उत्सव होता है, जिसे बरकती माना जाता है. कहा जाता है कि इस महीने में आसमान से अल्लाह की तरफ से रहमतें और बरकतें आती हैं.

बताया जाता है कि रमज़ान को दस-दस दिन के तीन हिस्सों में बांटा गया है. दस दिनों के एक हिस्सों को अशरा कहते हैं. अरबी में अशरा मतलब दस होता है. इसी कड़ी में रमज़ान का पहला अशरा रहमत का होता है. इस अशरे में अल्लाह की ज्यादा से ज्यादा इबादत करनी चाहिए ताकि अल्लाह उसकी सारी रहमतऔर बरकतें आप पर और आपके घर पर बरसाए. खुदा की सबसे ज्यादा बरकतें इसी अशरे में बरसती हैं.

रमज़ान का दूसरा अशरा मगफिरत का होता है, जिसमें अभी तक के सारे गुनाहों की माफ़ी मांगी जाती है. बताया जाता है कि रमज़ान में सच्चे दिल से इबादत की जाए तो पिछले सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं. तीसरा अशरा होता है निजात का. बताया जाता है कि इस महीने में पढ़ी गई नफिल नमाज़ फ़र्ज़ के बराबर होती है और फ़र्ज़ नमाज़ का सवाब (पुण्य) 70 गुना कर दिया जाता है. कहते हैं कि मक्का में एक नमाज़ पढ़ने पर एक लाख नमाज़ का सवाब हासिल होता है.

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