रक्षाबंधन पौराणिक मान्यता के साथ बंधा अटूट बंधन

रक्षाबंधन अर्थात् रक्षा का एक अटूट बंधन। ऐसा बंधन जिसमें भाई और बहन परस्पर एक दूसरे से जुड़े होते हैं। बहन अपने भाई से उसकी रक्षा का वचन लेती है। यही नहीं भाई भी अपनी बहन को स्नेह और प्रेम देता है। यह बंधन धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है। जिसमें यह बात सामने आती है कि जब दानवों और देवताओं के बीच युद्ध हुआ तो देवता असुरों के सामने कमजोर साबित होने लगे ऐसे में देवताओं में निराशा छा गई लेकिन इसी दौरान देवराज इंद्र की पत्नी ने उनके हाथ पर रक्षासूत्र बांध दिया और इसके बाद देवताओं का आत्मविश्वास बढ़ा।

जिसके बाद देवताओं ने असुरों पर विजय हासिल की। तभी से रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है। एक बार भगवान श्री कृष्ण को अंगुली में चोट लगी और फिर उनकी अंगुली से खून बहने लगा। इसके बाद द्रोपदी ने भगवान श्रीकृष्ण की अंगुली को अपने वस्त्र से एक टुकड़ा फाड़कर उससे बांध दिया और श्रीकृष्ण का रक्त बहना रूक गया। जिसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को उसकी रक्षा का वचन दिया। रक्षा बंधन का पर्व श्रावणी उपाकर्म के तौर पर भी जाना जाता है। इस दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा होती है। इस दिन ब्राह्मण सरोवर और नदी तट पर जाकर अपनी जनेऊ भी बदलते हैं।

इस दिन सरोवर का पूजन भी किया जाता है। इस पर्व को नारळी पौर्णिमा के तौर पर भी जाना जाता है। जब अलेक्जेंडर विजय के लिए निकला तो राजा पुरू उसे रोकने की योजना बना रहे थे। तब अलेक्जेंडर की पत्नी काफी परेशान हो उठी और उन्होंने राजा पुरू को राखी भेजी जिसके बाद उन्होंने अलेक्जेंडर को जीवनदान दे दिया। इस तरह से रक्षाबंधन की परंपरा आज तक कायम है। इस पर्व पर भाई बहन को रक्षा का वचन देते हैं तो बहनें भी उनके दायित्वों को निभाती हैं साथ ही भाई बहनों से जुड़े पारिवारिक दायित्वों को भी निभाते हैं। 

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