इस कथा को पढ़े बिना पूरा नहीं माना जाता राधा अष्टमी व्रत

हर साल राधा अष्टमी का व्रत किया जाता है जो बहुत मुख्य कहा जाता है। जी दरअसल इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा करने के साथ राधा रानी का भी पूजन किया जाता है। आपको बता दें कि भक्त इस पर्व को भी जन्माष्टमी की तरह ही मनाते है। हर साल यह जन्माष्टमी के 15 दिन के बाद मनाया जाता है। अब इस बार यह आज यानी 14 सितम्बर को मनाया जा रहा है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं राधा अष्टमी की कथा, जो आज के दिन जरूर पढ़नी या सुननी चाहिए।

राधा अष्टमी व्रत कथा- पद्म पुराण के अनुसार राधा जी महाराजा वृषभानु की सुपुत्री थीं। उनकी माता का नाम कीर्ति था। एक बार जब महाराजा वृषभानु यज्ञ के लिए भूमि की साफ-सफाई कर रहे थे, उस समय उनको भूमि पर राधाजी मिलीं थीं। जब भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में जन्म ल‍िया तो उनकी पत्नी लक्ष्मी जी, राधा के रुप में पृथ्वी पर आई थी। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार राधाजी, श्रीकृष्ण की सखी थीं और उनका विवाह रापाण या रायाण नाम के व्यक्ति के साथ सम्पन्न हुआ था। राधाजी अपने जन्म के समय ही वयस्क हो गई थीं। माता राधा को शाप की वजह से पृथ्वी पर आकर भगवान श्री कृष्ण का वियोग सहना पड़ा था।

क्या था श्राप- एक बार जब माता राधा स्वर्ग लोक से कहीं बाहर गई थी, उस वक्त श्रीकृष्ण विरजा नाम की सखी के साथ विहार कर रहे थे। वापस आने पर दोनों को साथ देख राधा नाराज हो गईं और व‍िरजा का अपमान कर द‍िया। लज्जा वश व‍िरजा नदी बनकर बहने लगी। राधा के व्‍यवहार पर श्री कृष्ण के परम प्रिय मित्र सुदामा को बहुत ही गुस्सा आ गया और वह कान्‍हा का पक्ष लेते हुए राधा से क्रोधित होकर बात करने लगे। सुदामा का इस तरह का व्यवहार देखकर राधा और भी नाराज हो गई और उन्होंने सुदामा को दानव रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। तब क्रोध में भरे हुए सुदामा ने भी बिना सोचे समझे राधा को मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। राधा के श्राप की वजह से सुदामा शंखचूड़ नामक दानव बने, जिसका वध बाद में भगवान शिव ने किया। दूसरी तरफ सुदामा के दिए गए श्राप की वजह से राधा जी को भी मनुष्य के रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर आना पड़ा और भगवान श्री कृष्ण का वियोग सहना पड़ा।

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