विज्ञान की नजर से ऐसा होगा आरक्षण का भविष्य!

देश के प्रत्येक हिस्से में आरक्षण की आंधी चल रही हो और चुनाव आयोग ने जातीय बाहुल बिहार में लोकतान्त्रिक चुनाव का बिगुल बजा दिया हो व राजनैतिक पार्टिया अपने तन, मन, धन से इसमे से मक्खन निकालने के लिए रोज डुबकियां लगा लगा बलोने / मथने का कार्य कर रही हो तो राजनेताओ के मक्खन खाने की डुबकी मार टूट पड़ना ही तो "राज करने का धर्म" कहलाता है | अपनी ईज्जत बनाने के लिए दुसरो की ईज्जत बिगाड़ो के आधुनिक राजनैतिक सिद्धान्त के युग में सब अपने-अपने सत्ता लोलुपता के तले एक के बाद एक बयान देते चले जा रहे है और अपने अपने कैडरों, कार्यकर्ताओ, सेना के नाम से बनाये ग्रुपो के माध्यम से जनता को उसकी रे समझाने के लिए झूठ को सौ बार बुलवा-बुलवा के सच में बदलने की सामाजिक इंजनियरिंग के फॉर्मूले का इस्तेमाल कर रहे है | सोशल मीडिया के माध्यम से सेकंड दर सेकंड फॉरवर्ड कर पिछले 60 वर्षो के समय को पार करने की होड़ मची है ताकि इसके हुए व होने वाले नुकसान को समझाया जा सके | 

एक निश्चित दायरे, कंपनी, संगठन, क्षेत्रवाद समूह से आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक रूप से बंधे सलाहकार समय की गर्मी को भापकर यह बताने, समझाने व कार्टून बनाकर दूध का दूध साबित करने के लिए लगे पड़े है कि आरक्षण भविष्य में हमें कहा तक बाँट डालेगा जैसे: - ऑपरेशन के समय डॉक्टरों की टीम का चुनाव जातिवाद के प्रमाण-पत्रो से | यह सब हुई आम बाते पर वाकई में हाथ क्या आयेगा उस पर ही विज्ञान के सिद्धान्त अनुसार रोशनी डालना ज्यादा जरुरी है क्युकि दूध का जल छाछ को भी फूक मारकर पीता है और मण्डल व कमंडल से बड़ी मुश्किल से छूटा इंसान मलाई को पहले चट करके फिर मक्खन के लिए रोड पर निकलने लगा है | आरक्षण व जातिवाद की आग में इतना मिश्रण हो जायेगा की उसे पृथक कर पाना असंभव हो जायेगा | इससे सोच बढ़कर सामाजिक स्तर की हो जाएगी | इसके बीच बीच में पुलिस का डंडा, सेना का मार्च, लाल बत्ती का सायरन, कुर्सी की चमक व पद का गुरुर आग के लिए "घी" का काम करेंगे | समय-समय पर शान्ति दिखाई देगी पर शोले में दबी आग हमेशा पहले से ज्यादा बड़ी लपटों के साथ निकलती रहेगी | राजनीती व चुनाव आयोग के राज्यों में ई वी एम मशीन भ्रमण के साथ-साथ सुर-ताल बदलते रहेंगे | जहा जिस जाती के लोग ज्यादा होंगे ऊट को उसी करवट बिठा दिया जायेगा | चुनाव का रंग व सीटो के जीत-हार वाले सर्वो के सच जाहिर होने लगेंगे तो यह ऊट दुबारा सीधा खड़ा हो जायेगा | विदेशो में घूम-घूम वह बिखरे ज्ञान को बटोर लाने वाले सिर्फ एक ही उपाय मोटी फीस के साथ देते दिखेंगे की आरक्षण जाति के आधार पर नहीं आर्थिक आधार पर देना शुरू कर दो | 

इसका परिणाम छोटे क्षेत्र विशेष वाले दल भड़केंगे पर इनके नेताओ के भूतकाल के काले अक्षर वाले अँधेरे व भविष्य की बारिश के काले बादलों के अंतर को जनता समझने लगेगी जो बिजली की चमक के भांति ज्ञान-प्रकाश व समय से पुलिस की भांति लेट नहीं पहले पहुंचे सोशल मीडिया के फॉरवर्ड से दो और इससे अधिक जातियों को आपस में हाथ-पैर वाली भिड़ंत से बचायेगी | बड़े ज्ञानी, सबल, बाहुबली, राज की चाह वाले नेताओ के पहले आरक्षण की मलाई त्याग के समर्पण से बच निकल चले जाने से भविष्य की बारिश से पहले गिरे छिटो से माटी की खुशबु महकती रहेगी | संसद, विधानसभा, सरकारे, जिम्मेदार लोग एक होने लगेंगे व आरक्षण को लेकर एक आयोग बनाने को तैयार हो जायेगे वह भी व्यक्तिवादी लोगो के अपनी-अपनी नाक का अहसास करने के बाद | प्रत्येक छोटा-मोटा राजनेता अपनी अपनी पार्टी के रंग का झंडा लेकर सबसे आगे खड़ा हो जायेगा क्युकि उसे आयोग का कार्यकाल बढ़ाते रहना, जज का बदलना, बिल को फाड़ डालना, शोर-शराबे से बोलते मुँह पर पर्दा डाल देना आदि पार्टी शिक्षा के प्रमाण-पत्र का गोल्ड़मेडल सीने पर टंगे होने का आत्मविश्वाश उन्हें दिलाता रहेगा | यह आयोग सदस्यों की संख्या और उसके चेहरों को लेकर आरक्षण की जातिवाद के खेल में साप-सीढ़ी के कोनसे नंबर पर निगल लिया जायेगा वो पता तक नहीं चल पायेगा | सरकारों द्वारा 50 फीसदी की उच्चतम न्यायालय की आरक्षण सीमा द्वारा ज्यादा आरक्षण करके न्याय की आखो पर काली पट्टी बन्दी मूर्त के पीछे छुपने-छुपाने का खेल चलेगा परन्तु कुछ वर्षो पूर्व "ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट" मामले में जिस तरह नया कानून बना नामचीनी सेकड़ो राजनेताओ को बचा उच्चतम न्यायालय को एक तरफ धकेला था वो अब किसी को छुपने नहीं देगा | 

इसमे राज्यों की बढ़ती तादाद आगे जाति के लोगो की संख्या के तुल्य आरक्षण प्रतिशत पर जाकर टिकेगी जो पहली बार जाति आधारित जनगणना का उदभव हुआ जहरीला फल होगा | यह जहर धन के लेन-देन पर आधारित कार्यो और जानवरो से भिन्न इंसानी समझदारी के सामाजिक व व्यवस्था के ताने-बाने को गला देगा जो सिस्टम के ताबूत की आखरी कील साबित होगा | इसी बीच असली टकराव होगा सोच के बढ़ते विकास के साथ व जिम्मेदारों के "राष्ट्र" के प्रति जनता के कर्तव्य के मुफ्त ज्ञान बाटने से | सामाजिक संगठन की सोच से राष्ट्रीय सोच के मध्य क्षेत्रीय व मानवीय जाति की सामूहिक सोच को विलोपित करना बड़े गड्ढे का निर्माण करेगा | ये गड्ढे छोटे-मोटे नेताओं, चुनाव के पार्टियो का टिकिट हासिल कर लाने वाले नेताओ व उनके अंधभक्त सिपेसलारो के धन, मान, मन को अपने में खीचते रहेंगे | राजनैतिक पार्टियो, सामाजिक व जातियाँ संगठन सभी सोच के एक ही पावदान में आते है इसलिए संसद, विधानसभाओ, पालिकाओं, पंचायतो के प्रतिनिधि जनता व सामाजिक संगठनो के है या राजनैतिक पार्टियो के, इसी खींचतान के मध्य मामला रैलियों व जनसम्पर्को में चप्पलो, जूतो से आगे निकल जायेगा | 

यहाँ सिर्फ एक ही उपाय है कानून न्यायिक आयोग के माध्यम से जातियाँ आरक्षण से आर्थिक स्तर के आरक्षण की तरफ बढ़ने का परन्तु पुराने ढर्रे को छोड़ "वैज्ञानिक-प्रबंधन" के सिद्धान्त से काम करके | यह वो तरीका है जिसे इंटरनेट पर उपलब्ध दुनिया को कोई भी सर्च इंजन कुछ नहीं बताता | यह उपाय सिर्फ अगले पांच वर्ष तक ही सार्थक रहेंगा क्युकि धन के माध्यम से अमीरी व गरीबी में लोगो को बाटना राजनीति सिद्धान्त का "दाम-भेद" का सयुक्त परिचालक है | ऐसे ही आगे समय रहते स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से जोड़ना ही पड़ेगा | यदि कुछ नहीं करा तो समय तो आगे बढ़ता रहेंगा व सभी को शुन्य की तरफ ले जायेगा यहाँ शुन्य पूर्ण बिखराव है और विकसित लोकतंत्र व्यवस्था का सर्जन भी | सदियों का ज्ञान व दुनिया को भारत का दिया विज्ञान का "शुन्य" उपहार भी यही सिखाता है की स्थाईत्व है तो सिर्फ "शुन्य" | इस शुन्य का एक नमूना राष्ट्रपति महोदय को भेजा जा चूका है |

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