Pegasus मामले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल, जानिए क्या कहता है इंडियन टेलीग्राफ एक्ट ?

नई दिल्ली: पेगासस मामले पर देश की सबसे बड़ी अदालत में तीसरी याचिका दायर हुई है. वरिष्ठ पत्रकार एन राम और शशि कुमार ने शीर्ष अदालत के मौजूदा या पूर्व जज की अध्यक्षता में जांच की मांग की है. केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण लिए जाने की भी मांग की गई है. इससे पहले वकील एमएल शर्मा और CPM के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास भी याचिका दायर कर चुके हैं.

स्मार्टफोन के इस दौर में निजी बातचीत या जानकारी की रक्षा को लेकर कानून बहुत पीछे चल रहा है. इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 में 2007 में हुए बदलाव के बाद फोन टैपिंग को लेकर नियम बने थे. इसके तहत देश की रक्षा या गंभीर अपराध की देखरेख के मामलों में उच्चस्तरीय अनुमति पर फोन टैपिंग हो सकती है. किसी राज्य में गृह सचिव स्तर से मिलने वाली इजाजत के बाद 60 दिन तक किसी फोन की टैपिंग हो सकती है. इसे अधिकतम 180 दिन तक जारी रखा जा सकता है. स्मार्टफोन में उपलब्ध सभी प्रकार के ऐप में डाली गई जानकारी की चोरी, कॉल या मैसेज के माध्यम से की गई बातचीत के लीक होने को लेकर यह कानून अलग से कुछ नहीं कहता है.

इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 और उससे संबंधित नियमों में इंटरनेट डेटा की सुरक्षा की बात कही गई है. किन्तु ऐसे मामलों को देखने के लिए के लिए डेटा प्रोटेक्शन ऑथोरिटी ऑफ इंडिया का गठन अभी तक नहीं किया गया है. 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी एन श्रीकृष्णा के नेतृत्व वाले आयोग ने डेटा सुरक्षा पर सिफारिश सरकार को सौंपी थी. इसके आधार पर सरकार ने पर्सनल डेटा की रक्षा के लिए पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2019 संसद में रखा. इसी के तहत डेटा प्रोटेक्शन ऑथोरिटी का गठन किया जाना है. किन्तु अभी यह बिल संयुक्त संसदीय कमिटी के पास लंबित है.

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