आखिर क्यों कौए को मानते है पितरों का प्रतीक?

पितृ पक्ष आरम्भ हो चुका है तथा ये 6 अक्टूबर तक चलेगा। पितृ पक्ष में कौए की महत्वत्ता बहुत बढ़ जाती है। कौओं को ग्रास दिए बगैर श्राद्ध पूरा नहीं होता। इन्हें पितरों का स्वरूप कहा जाता है। प्रथा है कि अगर पितर पक्ष में तर्पण देने के चलते यदि मुंडेर पर कौआ बैठ जाए तो ये बहुत शुभ संकेत होता है। अगर कौआ ग्रास खा ले तो इसे और भी शुभ माना जाता है। परम्परा है कि इससे हमारे पितर बेहद खुश होते हैं तथा परिवार को आशीर्वाद देते हैं। पितरों के आशीर्वाद से परिवार फलता-फूलता है। किन्तु ऐसे में एक प्रश्न जेहन में अवश्य आता है कि आखिर क्यों कौए को पितरों का स्वरूप कहा जाता है? 

प्रभु श्रीराम ने दिया था वरदान:-
कौए से संबंधित ये कथा त्रेतायुग की बताई जाती है। प्रथा है कि एक बार इंद्र के पुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण किया तथा माता सीता के पैर को चोटिल कर दिया। ये देखकर भगवान श्रीराम ने तिनके से ब्रह्मास्त्र चलाकर कौए की एक आंख फोड़ दी। तत्पश्चात, जयंत को अपनी भूल का अहसास हुआ तथा वो श्रीराम से क्षमा याचना करने लगा। इसके पश्चात् श्रीराम ने उसे क्षमा कर दिया तथा बोला कि आज के पश्चात् तुम्हें दिया गया भोजन पितरों को मिलेगा। तब से कौए को पितरों का स्वरूप बोला जाने लगा। क्योकि पितृ पक्ष पहले से ही पितरों को समर्पित होते हैं, ऐसे में अगर कौआ नजर आ जाए या वो आपका दिया हुआ ग्रास उठा ले, तो इसे पितरों का आशीर्वाद माना जाता है।

ये भी है मान्यता:-
शास्त्रों में कौओं को यमराज का प्रतीक कहा गया है। यमराज मृत्यु के देवता हैं। प्रथा है कि अगर कौआ आपका दिया हुआ भोजन ग्रहण कर ले, तो इससे यमराज बहुत खुश होते हैं तथा उन्हें सभी कष्टों से छुटकारा प्राप्त होने के साथ शांति प्राप्त होती है। माना जाता है कि प्राचीन वक़्त में यमराज ने कौए को वरदान दिया था कि तुम्हें दिया गया खाना पितरों को शांति देगा। तब से कौए को खाना देने की परम्परा चल रही है।

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