श्रद्धा से किया जाए वह है श्राद्ध

सौहल श्राद्ध का अपना महत्व होता है। दरअसल श्राद्ध हम अपने दिवंगत पितरों की शांति के लिए करते हैं। यह पुराणोक्त और शास़्त्रोक्त है। श्राद्ध को लेकर कहा जाता है कि जो भी श्रद्धा से किया जाए वह श्राद्ध है। श्राद्ध में आमतौर पर पितरों की शांति के लिए भोजन बनाकर उसे पक्षी या कौऐ, पशु में गाय, व श्वान अर्थात कुत्ते के लिए और जलचर प्राणियों के लिए कुछ चांवल आदि के दाने व ब्राह्मण के लिए भोजन दान करने का विधान है। इस माध्यम से जीवात्मा तृप्त होती है। माना जाता है कि हमारे पितर इन योनियों में आकर वे भोजन ग्रहण करते हैं और तृप्त हो जाते हैं।

अलग - अलग दिन के श्राद्ध का अलग - अलग महत्व है। तिथि के साथ विशेष वार का होना श्राद्ध के महत्व को बढ़ा देता है। यही नहीं श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त या उनके लिए किसी तीर्थ, सरोवर में तर्पण, पिंडदान, पूजन करना बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है। इस निमित्त कई बार श्रद्धालु पिंडदान भी करते हैं।

पितरों को तीर्थों के जल से तर्पण कर तृप्त किया जाता है। जिससे मनोवांछित फल मिलता है और पितरों की कृपा होती है। मृत्यु लोक में उज्जैन में सिद्धवट, बिहार के श्री गया, नासिक आदि क्षेत्रों को पितृमोक्ष के सिद्ध स्थलों के तौर पर जाना जाता है। उज्जैन में तो अक्षय वट ही स्थापित है जो कि माता पार्वती ने अपने हाथों से रोपा था। यहां भगवान सिद्धनाथ का निवास है जहां पितृमोक्ष के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की कामना पूर्ण होती है। इसके अलावा उज्जैन में गयाकोठा भी बहुत ही सिद्ध और पितृमोक्ष का श्रेष्ठ स्थल है।

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