कौवों के बिना अधूरा है पितृपक्ष, जानिए इसका कारण और पौराणिक महत्व

नई दिल्ली: पितृपक्ष के दौरान कौवों का महत्व काफी बढ़ जाता है, क्योंकि मान्यता है कि कौवे को अगर ग्रास न दें तो श्राद्ध कर्म पूरा ही नहीं होता। उसे अधूरा ही माना जाता है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध एवं पितृ पक्ष कहलाता है। श्राद्ध पक्ष, पितरों को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है। 

श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों में पितरों के अतिरिक्त, देव, गाय, श्वान, कौए और चींटी को भोजन खिलाने का रिवाज है। गाय में सभी देवी-देवताओं का वास होता है, इसलिए गाय का भी काफी महत्व है। वहीं पितर पक्ष में श्वान और कौए पितर का रूप होते हैं इसलिए उन्हें भोजन देने का विधान है। श्राद्ध पक्ष से संबंधित कई परम्पराएं भी हमारे समाज में प्रचलित हैं। ऐसी ही एक परम्परा है, जिसमें कौवों को आमंत्रित कर उन्हें श्राद्ध पक्ष में भोजन कराया जाता है। दरअसल, कौआ यमराज का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, अगर कौआ श्राद्ध का भोजन ग्रहण कर लेता है, तो पितर प्रसन्न और तृप्त हो जाते हैं।

वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण  केंद्र के आचार्य डॉ. आत्माराम गौतम ने जानकारी दी है कि पुराण, रामायण, महाकाव्यों  एवं अन्य धर्म शास्त्र और प्राचीन ग्रन्थों में पितृपक्ष में कौवों की महत्ता को विस्तार से बताया गया है। इससे संबंधित कई रोचक कथाएं एवं मान्यताएं भी पुस्तकों में उल्लेखित हैं।

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