जन्म के समय राम था नाम, जानिए कैसे बने परशुराम

3 मई 2022 को अक्षय तृतीया का पर्व है। जी हाँ और इसे बहुत शुभ दिन माना जाता है। आप सभी को बता दें कि अक्षय तृतीया पर शुभ और मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं। जी हाँ और भगवान परशुराम का जन्म इसी दिन हुआ था। इस वजह से अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में मनाया जाता है। आप सभी को बता दें कि परशुराम भगवान विष्णु के अवतार थे। जी दरअसल उन्हें विष्णु जी का उग्र अवतार माना जाता था। कहते हैं उन्होंने श्रीराम से पहले धरती पर अवतार लिया था। यह भी कहा जाता है कि उन्हें अपने पिता से चिरंजीवी रहने का वरदान मिला था और इसी के चलते परशुराम आज भी मौजूद हैं। आइए बताते हैं उनकी जन्म की कथा।

कथा- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार परशुराम को विष्णु के दशावतारों में से छठा अवतार माना जाता है। उनके पिता ऋषि जमदग्नि थे और जमदग्नि ने चंद्रवंशी राजा की पुत्री रेणुका से विवाह किया था। उन्होंने पुत्र के लिए एक महान यज्ञ किया था और इस यज्ञ से प्रसन्न होकर इंद्रदेव ने उन्हें तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया और फिर अक्षय तृतीया को परशुराम ने जन्म लिया। कहा जाता है ऋषि जमदग्नि और रेणुका ने अपने पुत्र का नाम राम रखा था और राम ने शस्त्र का ज्ञान भगवान शिव से प्राप्त किया था। वहीँ शिवजी ने उन्हें प्रसन्न होकर अपना फरसा यानी परशु दिया था और इसी के बाद वे परशुराम कहलाए। परशुराम को चिरंजीवी माना जाता है, इसका मतलब है वह आज भी जीवित हैं।

उनका जिक्र रामायण और महाभारत दोनों काल में है। कहते हैं कि कलयुग के अंत में जब विष्णु के कल्कि अवतार जन्म लेंगे, तब भी परशुराम आएंगे। कहते है कि उन्होंने क्षत्रिय कुल के हैहय वंश का 21 बार नाश किया था और महाभारत काल में उन्होंने भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण को अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान दिया था। श्रीकृष्ण को उन्होंने सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था और सतयुग के दौरान भी उनकी एक कथा प्रचलित है, जिसके मुताबिक वे एक बार भगवान शिव के दर्शन के लिए गए तो गणेशजी ने उन्हें रोक लिया। जी हाँ और इससे गुस्सा होकर परशुराम ने गणपति का एक दांत तोड़ दिया।

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