शिव के चरणों में शीश नवाने करते हैं 118 किमी की यात्रा

सृष्टि के कण कण में सांबसदा शिव का वास है। भगवान शिव को जहां आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर और मृत्यु लोक में श्री महाकालेश्वर के तौर पर प्रमुखता के साथ पूजा जाता है वहीं भगवान शिव के कई शिवलिंगों का अर्चन करना पुण्यदायी होता है। भगवान शिव के पारद, स्फटिक, पाषाण और मिट्टी से बने पार्थिव शिवलिंगों का पूजन कर श्रद्धालु अपने जीवन को धन्य करते हैं।

ऐसे ही शिव को भजने की यात्रा का नाम है पंचक्रोशी यात्रा। इसे पंचेशानि यात्रा भी कहा जाता है। स्कंदपुराण के अवंतिखंड में इस यात्रा का वर्णन मिलता है। श्रद्धा की यह यात्रा वैशाख मास की दशमी से प्रारंभ होती है और अमावस्या तक चलती है। यह यात्रा मध्यप्रदेश के पर्यटन और धार्मिक नगर उज्जैन में प्रतिष्ठापित अतिप्रचाीन महाकाल वन के चार शिवलिंगों की दर्शन यात्रा है।

दरअसल प्राचीन उज्जैन के चारों कोनों में चार द्वारपाल के तौर पर प्रतिष्ठापित शिवलिंगों का पूजन, अभिषेक श्रद्धालुओं द्वारा किया जाता है। श्रद्धालु इन शिवलिंगों के दर्शन के माध्यम से 118 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। जिसमें वे पूर्व में पिंग्लेश्वर, कायावहरोणेश्वर, बिल्वेश्वर और दुद्र्धेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं। इस यात्रा में श्रद्धालु मार्ग में पड़ावों और उपपड़ावों पर ठहरते हैं।

इस दौरान वे भजन, कीर्तन, शिप्रा स्नान और मालवा के लोकप्रिय भोजन दाल - बाटी का आनंद लेते हैं। श्रद्धालु आस्था के साथ कड़ी धूप में चलते हैं तो कुछ सुबह, शाम चलते हैं। इस यात्रा के माध्यम से श्री महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग की परिक्रमा का पुण्य और 84 महादेव में शामिल शिवलिंगों के दर्शनों का लाभ श्रद्धालुओं को मिलता है। 

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