रिटायरमेंट के दिन जस्टिस दीपक मिश्रा ने मीडिया से किए थे ऐसे सवाल

3 अक्टूबर 1953 को जन्मे बतौर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा मीडिया के प्रति संवेदनशील थे। उन्होंने मीडिया की आजादी पर अंकुश के प्रयास को परवान नहीं चढ़ने दिया। कई अवसरों पर उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पत्रकारों को अभिव्यक्ति की आजादी दी जानी जरुरी है। बिहार के एक पूर्व विधायक की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने बोला था  कि रिपोर्टिंग में कुछ गलती भी हो सकती है, लेकिन इसे हमेशा के लिए पकड़कर नहीं रखा जा सकता। पत्रकारों को अभिव्यक्ति की आजादी की अनुमति भी दी जा चुकी है। दरअसल, याचिकाकर्ता पूर्व विधायक का बोलना था कि संबंधित न्यूज चैनल ने अवैध तरीके से भूमि आवंटन की खबर दिखाई गई थी और इसलिए चैनल पर आपराधिक मानहानि का केस फिर से चलना चाहिए, लेकिन चीफ जस्टिस ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका को रद्द कर दिया था।

बता दें कि जस्टिस मिश्रा समय-समय पर मीडिया को समझाइश भी देते रहे। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मीडिया को अधिक जिम्मेदार बनने की आवश्यकता थी। खासकर जय शाह मानहानि केस की सुनवाई के बीच उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि आजादी का आशय कुछ भी लिखने से नहीं होना चाहिए। दीपक मिश्रा ने बोला था ‘हम प्रेस की आवाज को नहीं दबा रहे हैं, लेकिन कभी-कभी पत्रकार कुछ ऐसी बातें लिखते हैं जो पूर्ण रूप से अदालत की अवमानना भी की। कुछ उच्च पदों पर बैठे पत्रकार कुछ भी लिख सकते हैं, क्या यह वाकई पत्रकारिता है?' मैं हमेशा से ही प्रेस की आजादी का पक्षधर रहा हूं, लेकिन किसी के बारे में कुछ भी बोल देना और कुछ भी लिख देना यह गलत है, इसकी भी एक हद है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ये नहीं सोच सकता कि वो रातों रात पोप बन जाता।’

आमतौर पर चीफ जस्टिस मीडिया से 1 निश्चित दूरी रखना ही पसंद करते है, लेकिन दीपक मिश्रा ने एक तरह से इस अघोषित परंपरा को समाप्त करने की कोशिश भी की। उन्होंने अपने अंतिम कार्यदिवस पर भी वह दिल्ली स्थित प्रेस लाउंज में पत्रकारों के साथ चाय पीने पहुंचे। हालांकि, यहां भी उन्होंने पत्रकारों के सवालों का जवाब देने के बजाए सवाल पूछने में अधिक दिलचस्पी दिखाई, जैसे ‘एप्रिशिएशन और एडमायर’ के बीच क्या अंतर है?  जब भी पत्रकार प्रश्न पूछने लगते तो वे कहते, ‘मैं यहां आपका गेस्ट हूं। मुझसे सवाल मत पूछो।’

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