ओमिक्रॉन से हुए संक्रमित तो बनेगी ऐसी इम्युनिटी कि कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा कोरोनावायरस!

कोरोना के ओमिक्रॉन वेरिएंट (Omicron) ने लोगों को हैरान परेशां किया हुआ है लेकिन अब एक अच्छी खबर आई है। जी दरअसल ओमीक्रॉन से संक्रमित व्यक्ति में प्रभावी प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) विकसित हो जाती है, जो ना केवल ओमिक्रॉन बल्कि डेल्टा (Delta Variant) समेत अन्य वेरिएंट्स को भी बेअसर कर सकती है। जी हाँ, इस बात का खुलासा खुद आईसीएमआर की ओर से किया गया है। उनके द्वारा की गई एक स्टडी (ICMR Study) में इस बारे में कहा गया है। आप सभी को बता दें कि इस स्टडी रिपोर्ट में यह सामने आया है कि ओमिक्रॉन जनित प्रतिरोधक क्षमता वायरस के डेल्टा वेरिएंट को बेअसर कर सकती है।

इससे डेल्टा से दोबारा संक्रमित होने की आशंका बहुत कम हो जाती है। जी दरअसल सामने आने वाली स्टडी में यह कहा गया है कि ऐसा होने से संक्रमण फैलाने के लिहाज से डेल्टा का प्रभुत्व खत्म हो जाएगा। वहीं दूसरी तरफ रिपोर्ट में ओमिक्रॉन को लक्ष्य करके टीका बनाने पर जोर दिया गया है। आप सभी को हम यह भी बता दें कि एस्ट्राजेनेका, मॉडर्ना, फाइजर समेत कई अन्य कंपनियां उन्नत वैक्सीन बनाने की ​तैयारी में है।

ऐसा दावा किया जा रहा है कि मार्च के अंत तक ओमिक्रॉन वेरिएंट से मुकाबले के लिए वैक्सीन आ जाएगी, हालाँकि क्या होने वाला है कुछ कहा नहीं जा सकता है। वहीं दूसरी तरफ पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, आईसीएमआर (ICMR) की ओर से कुल 39 लोगों पर यह स्टडी की गई, जिनमें से 25 लोगों ने एस्ट्राजेनेका के कोरोनारोधी टीके की दोनों खुराक ली थी, वहीं आठ लोगों ने फाइजर के टीके की दोनों खुराक ली थी, जबकि छह लोगों ने कोरोना की कोई वैक्सीन नहीं लगवाई थी। इन सभी के अलावा 39 में से 28 लोग यूएई, अफ्रीकी देशों, मध्य एशिया, अमेरिका और ब्रिटेन से लौटे थे, जबकि 11 लोग उच्च जोखिम युक्त संपर्क में थे। ये सभी लोग ओमिक्रॉन से संक्रमित थे।

इस अध्ययन में मूल कोरोना वायरस से दोबारा संक्रमण पर आईजीजी एंटीबॉडी (igg Antibody) और न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी (NAB) प्रतिक्रिया का अध्ययन किया गया। सामने आने वाली रिपोर्ट में यह कहा गया, ‘‘हमने अध्ययन में पाया कि ओमिक्रॉन से संक्रमित लोगों में पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई, यह न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी ओमिक्रॉन और डेल्टा समेत कोरोना के अन्य प्रकार को न्यूट्रलाइज कर सकती हैं।’’ वहीं यह अध्ययन सीमित बताया जा रहा है। इसी के साथ इसका कारण टीकारहित समूह में प्रतिभागियों की संख्या बहुत कम होना और संक्रमण के बाद की अवधि का छोटा होना है।

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