अब पर्दानशी नहीं रहा जिस्मफरोशी का व्यापार

Jan 04 2018 01:31 PM
अब पर्दानशी नहीं रहा जिस्मफरोशी का व्यापार

सदियाँ बदली, युग बदला, नहीं बदली तो इंसानी फितरत. आदम जात के अस्तित्व में आने के साथ ही कुछ ऐसे गुण भी अस्तित्व में आये जो फितरत से कभी बाहर नहीं हुए, उनमे से ही एक है जिस्म की भूख या काम वासना. इस भूख के लिए आदि काल में ही सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ वेश्यावृत्ति का भी पूरी दुनिया में चरम और परम विकास हुआ. हवस को शोक अदायगी का नाम देकर अशर्फियों के जोर से रईसों ने इसे अपने -अपने काल में खूब शानो-शौकत से पनाह दी.

पोस्ट मॉडर्न सोसाइटी में वेश्यावृत्ति के अलग-अलग रूप भी सामने आए हैं. रेड लाइट इलाकों से निकल कर वेश्यावृत्ति अब मसाज पार्लरों एवं एस्कार्ट सर्विस के रूप में भी फल-फूल रही है. देह का धंधा कमाई का चोखा जरिया बन चुका है. गरीब और विकासशील देशों जैसे भारत, थाइलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि में सेक्स पर्यटन का चलन शुरू हो चुका है. दुनिया के अति पश्चात् संस्कृति वाले मुल्को में जिस्मफरोशी को कानूनन वैधता हासिल है. जिस्मफरोशी दुनिया के पुराने धंधों में से एक है. बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है.

गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक वेश्याएं रखते थे. उन्होंने वेश्यालय भी खोले. तब वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं. मुगलों के हरम में सैकड़ों औरतें रहती थीं.जब अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार किया तो इस धंधे का स्वरूप बदलने लगा. राजाओं ने अंग्रेजों को खुश करने के लिए तवायफों को तोहफे के रूप में पेश करना शुरू किया. पुराने वक्त के कोठों से निकल कर देह व्यापार का धंधा अब वेबसाइटों तक पहुंच गया है. इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ी पुलिस के लिए इस नेटवर्क को भेदना खासा कठिन है. सिर्फ नेट पर अपनी जरूरत लिखकर सर्च करने से ऐसी दर्जनों साइट्स के लिंक मिल जाएंगे जहां हाईप्रोफाइल वेश्याओं के फोटो, फोन नंबर और रेट तक लिखे होते हैं. इन पर कालेज छात्राएं, मॉडल्स और टीवी-फिल्मों की नायिकाएं तक उपलब्ध कराने के दावे किए जाते हैं.

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