हंगामा खड़ा करना इनका मकसद नहीं, इनकी कोशिश है कि मुद्दों की बारिश होना चाहिए

हंगामा, हंगामा, हंगामा, बस हंगामा! जी हां! भारतीय संसद में यही एक बात सामने आती है. जब भी संसद की कोई बात हो तो लोगों को यही जानकारी मिलती है कि विपक्ष द्वारा जमकर हंगामा मचाने के कारण सदन स्थगित हो गया. नहीं तो किसी संसद सदस्य को श्रद्धांजलि दी गई जिसके बाद सदन की कार्रवाई स्थगित कर दी गई।

संसद सदस्य को श्रद्धांजलि देने की बात तो समझ में आती है लेकिन जो मामले जांच के दायरे में हों या न्यायालय में हों उन पर हंगामा करना समझ नहीं आता वह भी महत्वपूर्ण बिलों को रोककर. हाल ही में अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकाॅप्टर डील में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस और आरोप लगाने वाली भाजपा के बीच इसी तरह का विवाद संसद में देखने को मिला।

दोनों ओर से तर्कों की बौछार होती रही. एनडीए का खेमा उद्योगपति विजय माल्या के विदेश चले जाने के मामले में एक मजबूत ढाल ढूंढ लाया जो कि कांग्रेस और यूपीए के खेमे के तीरों को रोक सके. यह ढाल थी अगस्ता वेस्टलैंड मामले की. कांग्रेस के दिग्गजों पर आरोप लगे. सानिया, मनमोहन जैसे नेता इसमें घिरा गए. फिर कांग्रेस ने सत्तापक्ष पर कई तरह के हमले किए।

संसद में हंगामा हुआ लेकिन अगस्ता मामला उछलता रहा. ऐसे मे कांग्रेस ने वाॅक आउट कर संसद के बाहर प्रदर्शन कर दिया. कांग्रेस ने सरकार पर महंगाई, वादे पूरे न करने विकास का हवाई किला बनाने के आरोप लगाए. लेकिन सांसदों को जिस कार्य के लिए सदन में अवसर दिया गया उस पर कोई चर्चा नहीं हुई. देश हित से जुड़े बिलों को सदन में पेश नहीं किया जा सका।

बहुचर्चित जीएसटी बिल पर तो विचार ही नहीं हो सका. उल्लेखनीय है कि इस बिल को राज्यसभा में पेश होना है और राज्यसभा में कुछ नए सदस्यों ने शपथ ली है ऐसे में राज्य सभा में इस बिल के पारित होने की पूरी संभावना है लेकिन राजनीतिक छींटाकशी संसदीय मर्यादाओं और संसदीय कार्य को एक ओर रख रही है जिससे देश हित के मसले सदन में सामने नहीं आ पा रहे हैं। 

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