हरियाणा के इस गांव में तिरंगा फहराने की मनाही है

नई दिल्ली: ये वो दौर था जब ईस्ट इंडिया कंपनी का कहर भारत वासियों पर जमकर बरस रहा था. कुछ चुपचाप इसका सामना कर रहे थे और कुछ ने विद्रोही रूप धारण कर लिया था. आजाद भारत की मांग उठने लगी थी और नौजवान क्रांतिकारियों की टोली सेना का रूप लेने लगी थी. लेकिन 29 मई 1857 की तारीख आज भी ब्रिटिश शाषन काल की सबसे खूंखार बर्बरता की निशानियों में से एक है. ये वहीँ दिन है जब हरियाणा के रोहतक गांव में ब्रिटिश फ़ौज ने बदला लेने के इरादे से ऐसा कत्लेआम किया जिसे भुलाये नहीं भुला जा सकता है. अग्रेजों की निर्दयी फ़ौज ने पूरे के पूरे एक गांव को ही मौत के हवाले कर दिया था. इसके कत्लेआम के सबूत आज भी इस गांव के अवशेषों में देखने को मिल जाते है.

ईस्ट इंडिया कंपनी के घुड़सवारों ने पूरे गांव को नष्ट कर दिया था. कई लोग अपनी जान बचा गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए. इस कत्लेआम के बाद कई दशकों तक इस धरती पर आबादी नहीं बस सकी. दरअसल ये ग़दर 1857 में हुए सैनिक विद्रोह (जिसे स्वतंत्रता की पहली लड़ाई भी कहा जाता है.) के बदले में हुई थी. रोहनात गांव, हरियाणा के हिसार ज़िले के हांसी शहर से कुछ मील की दूरी पर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है. गांव वालों ने आगजनी के डर से भागे ब्रिटिश अधिकारियों का पीछा कर उनका कत्ल करने के साथ ही हिसार जेल तोड़ कर कैदियों को छुड़ाने का कारनामा किया था. इससे गुस्साए ब्रिटिश सैनिकों ने पूरे गांव को ही तबाह करने का फैसला कर लिया था.

आज इस गांव में कुछ जनसँख्या तो लौट आयी है लेकिन गांववाले यहाँ की मिट्टी पर अब तिरंगा नहीं लहराते. 5,000 की आबादी वाले रोहनात के गांव वालों में गुस्सा है और वो तिरंगा नहीं लहराते. उनको दुख है कि सरकार की ओर से उनके पूर्वजों की इज़्ज़त नहीं की जा रही और वाजिब मुआवजा नहीं दिया जा रहा. गांव के सरपंच रवींद्र बोरा के मुताबिक, "बेशक गांव के लोग राष्ट्रीय उत्सवों में हिस्सा लेते हैं लेकिन गांव में तब तक तिरंगा नहीं लहराया जाएगा जब तक कि इंसाफ़ नहीं मिलता." 23 मार्च 2018 को मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर गांव में तिरंगा लहराने पहुंचे और मुआवजे के नए वादे भी किए लेकिन रवींद्र बोरा ने बताया कि हम तब तक तिरंगा नहीं लहराएंगे जब तक कि हमारी ज़मीन वापस नहीं दी जाती और हमारे पूर्वजों को स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर दर्जा नहीं दिया जाता.

 

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