सिविल सेवा चयन के बाद भी नेताजी ने चुना आज़ादी का रास्ता

Jan 23 2016 10:32 AM

भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वालों में बेहद लोकप्रिय रहे हैं नेताजी सुभाषचंद्र बोस। वे नेताजी जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए कृत संकल्पित रहे वे सुभाष बाबू जिन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए विदेशों के साथ मिलकर प्रयास किए वे सिंगापुर गए। उन्होंने युवाओं को संगठित किया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस था। उनकी माता का नाम प्रभावती था। उनके पिता जानकीनाथ बोस कटक शहर के लोकप्रिय अभिभाषक थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की 14 संतानें थीं जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे भी शामिल थे। 

नेताजी सुभाषचंद्र बोस अपने पिता की 9 वीं संतान थी। नेताजी एक संपन्न परिवार से थे लेकिन इसके बाद भी वे स्वाधीनता के संघर्ष में आए। नेताजी ने कलकत्ता के प्रेजि़डेंसी काॅलेज और स्काॅटिश चर्च काॅलेज से हुई थी बाद में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी हेतु इंग्लैंड चले गए।

तत्कालीन इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा में उन्होंने उच्चतम अंक अर्जित कर 4 था स्थान हासिल किया। हालांकि नेताजी एक प्रशासनिक अधिकारी बनकर अंग्रेजों की चाकरी कर उच्च पद प्राप्त कर सकते थे लेकिन उन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। सुभाषबाबू महात्मा गांधी का सम्मान करते थे लेकिन वे गांधी के विचारों से सहमत नहीं थे। हां महात्मा गांधी के उदार दल का नेतृत्व भी उनके द्वारा किया जाता था।

वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय योजन आयोग गठित किया। इस तरह की नीति गांधीवादी आर्थिक विचारों की तरह नहीं थी। अफगानिस्तान और सोवियत संघ के साथ वे जर्मनी पहुंच गए। वर्ष 1933 से 1936 तक वे योरप में रहे। हिटलर के नाजीवाद और मुसोलिनी के फासीवाद का दौर था ऐसे में जर्मन इंग्लैंड के अत्याचारों से प्रभावित था।

भारतीय नेताओं में सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह ऐसे कुछ क्रांतिकारी थे जिन्होंने यह बात समझी थी कि सारा विश्व इंग्लैंड के उपनिवेशवाद से परेशान है ऐसे में उन्होंने विश्व के ऐसे राष्ट्रों को संगठित किया और भारत की आज़ादी के लिए बाहर से प्रयास किए। 

सुभाषबाबू भेस बदलने में भी बहुत सक्षम थे। एक बार उन्होंने अफगान पठान का वेष भी धरा था। उनहोंने स्वाधीनता प्राप्ति के लिए 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुंचे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा का लोकप्रिय नारा दिया। 18 अगस्त 1945 को टोक्यो जाते समय ताइवान के पास नेताजी का हवाई दुर्घटना में निधन हो गया। नेताजी ने आज़ाद हिंद फौज का गठन किया था।

आज़ाद हिंद फौज के लिए महिलाओं ने अपने कंगन, सोने के आभूषण आदि तक बेच दिए। नेताजी सुभाषचंद्र बोस भारत की स्वाधीनता के लिए अपना योगदान देने के लिए जाने जाते हैं मगर वर्ष 1945 में वे इहलोक सिधार गए। हालांकि उनकी मृत्यु को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है।

मगर अधिकांश स्थानों से यह ज्ञात होता है कि उनकी मृत्यु 18 अगस्त 1945 को जापान की यात्रा के दौरान एक विमान हादसे में होने की बात कही जाती है हालांकि इस मामले में यह भी कहा जाता है कि नेताजी के जीवित होने के प्रमाण इस हादसे के बाद भी मिले थे साथ ही यह भी कहा जाता है कि जिस शव की शिनाख्त नेताजी सुभाषचंद्र बोस के शरीर के तौर पर हुई थी वह शव नेताजी का नहीं था। इस मामले में अभी भी रहस्य बना हुआ है और सरकार इस मामले में प्रयास कर रही है।