नरसिंह जयंती पर जरूर सुने भगवान नृसिंह की यह कथा

हर साल आने वाली नरसिंह जयंती इस साल 6 मई को है. ऐसे में आप सभी जानते ही होंगे भगवान नृसिंह श्रीहर‍ि के चौथे अवतार माने जाते हैं और यह अवतार अन्‍य अवतारों से थोड़ा अलग था. जी दरअसल इसमें वह आधे सिंह और आधे मनुष्‍य के रूप में नजर आए थे. अब आज हम आपको बताने जा रहे हैं भगवान नृसिंह की कथा.


कथा - प्राचीन काल में कश्‍यप नामक एक ऋषि थे. उनकी पत्‍नी थी द्विती. उनके दो पुत्र हिरण्‍याक्ष और हिरण्यकश्यप हुए. हिरण्‍याक्ष के आतंक से सभी को मुक्‍त कराने के लिए भगवान व‍िष्‍णु ने वराह रूप धारण करके उसका वध कर द‍िया था. इसी बात का प्रतिशोध लेने के लिए हिरण्यकश्यप ने कठोर तप किया. उसने ब्रह्माजी को प्रसन्‍न करके उनसे अमरता का आशीर्वाद मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने जब यह वरदान देने से मना कर द‍िया तो उसने उसकी मृत्‍यु न घर में, न बाहर, न अस्‍त्र से और न शस्‍त्र से, न द‍िन में, न रात में, न मनुष्‍य से न पशु से और न आकाश में न पृथ्‍वी में हो, यह वरदान मांगा. यह सुनकर ब्रह्माजी तथास्‍तु कहकर अंतर्धान हो गए. ब्रह्माजी से वरदान प्राप्‍त करने के बाद हिरण्यकश्यप ने खुद को भगवान मान लिया. उसने अपनी प्रजा को भी यह आदेश द‍िया कि सब उसको ही भगवान मानेंगे और उसकी ही पूजा करेंगे. उसने यह भी घोषणा करवाई कि जो भी उसकी बात नहीं मानेगा उसे मृत्‍युदंड द‍िया जाएगा. हिरण्यकश्यप की बात सबने तो मान ली लेकिन उसके पुत्र प्रहृलादजी ने नहीं मानी. वह श्रीहर‍ि के अनन्‍य भक्‍त थे.

द‍िन-रात उन्‍हीं की भक्ति में लीन रहते थे. हिरण्यकश्यप ने कई बार उसे समझाने का प्रयास किया. लेकिन जब वह नहीं माने तो उन्‍हें मारने का प्रयास किया. हिरण्यकश्यप के लाख समझाने और प्रयासों के बाद भी जब प्रह्लाद जी नहीं मानें. तो एक द‍िन उसने प्रह्लाद से पूछा क‍ि, ''कहां रहता है तुम्‍हारा भगवान?'' उन्‍होंने कहा क‍ि ''वह तो सर्वत्र व्‍याप्‍त हैं.'' तब हिरण्यकश्यप ने सामने खड़े खंभे को देखकर पूछा कि 'क्‍या इसमें हैं तुम्‍हारे भगवान?' प्रह्लाद जी ने कहा कि 'हां, वह तो हर जगह हैं और इसमें भी हैं.' यह सुनकर हिरण्‍यकश्‍यप को गुस्‍सा आ गया और उसने क्रोध में आकर उसपर प्रहार कर द‍िया. तभी खंभे को चीरकर भगवान व‍िष्‍णु प्रकट हुए. जो कि न पशु थे न मनुष्‍य. उन्‍होंने हिरण्‍यकश्‍यप के ब्रह्माजी से मांगे गए वरदान के अनुसार नृसिंह का रूप धारण किया था. इसके बाद हिरण्‍यकश्‍यप को उन्‍होंने न द‍िन न रात यानी क‍ि गोधूलि बेला, न अस्‍त्र न शस्त्र यानी कि नाखून से, घर के अंदर न बाहर यानी कि घर की चौखट पर, न जमीन न आसमान तो अपनी गोद में बिठाया और अपने नाखूनों से उसका वध कर द‍िया.

हिरण्यकश्यप के वध के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ. उनके इस व‍िकराल रूप से तीनों लोक कांपने लगे. तब सभी देवता श‍िवजी की शरण में पहुंचे और उनसे श्रीहर‍ि का क्रोध शांत करने की प्रार्थना की. इसके बाद भोलेनाथ ने शलभ अवतार लिया और नृसिंह को अपनी पूंछ से खींचकर पाताल लोक लेकर गए. वहां काफी देर तक उसे वैसे ही अपनी पूंछ में जकड़कर रखा. भगवान नृसिंह ने काफी प्रयास क‍िए लेकिन खुद को छुड़ा नहीं पाए और थोड़ी ही देर में नृसिंह भगवान ने भोलेनाथ को पहचान लिया और तब जाकर उनका क्रोध शांत हुआ. 

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