मुख़्तार अंसारी: दादा रहे कांग्रेस अध्यक्ष, चाचा उपराष्ट्रपति, खुद पर दर्ज हैं हत्या के 18 केस

मुख़्तार अंसारी को लेने यूपी पुलिस पंजाब क्या पहुंची, लोगों को विकास दुबे की याद आ गई। याद है ना जब यूपी पुलिस गैंगस्टर विकास दुबे को लेने मध्य प्रदेश आई थी और वापस लौटते वक़्त पुलिस की गाड़ी पलटी, दुबे ने भागने की कोशिश की और वहीं से उसका परलोकगमन हो गया। इसी विकास दुबे ने कानपुर एनकाउंटर में 8 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया था, सजा तो मिलनी ही थी, लेकिन इस तरह मिलेगी ये किसी ने नहीं सोचा होगा। खैर, आज हम यहां मुख़्तार अंसारी के बारे में बात करने वाले हैं कि आखिर कैसे एक स्वतंत्रता सेनानी का पोता (मुख़्तार) यूपी में जुर्म का बेताज बादशाह बन गया, जिसके नाम से भी लोग कांपने लगे। 

बॉलीवुड की फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि एक बाहुबली शख्स खुले आम लूट, हत्या, किडनेपिंग, फिरौती सहित तमाम वो काम करता है, जो कानून की नज़र में गुनाह है, लेकिन लोग उसके खिलाफ मुँह खोलने से डरते हैं और जो कुछ एक सत्य को अपनी जान से भी बड़ा मानकर उसके खिलाफ मुँह खोलते हैं, उन्हें सरे बाजार मौत के घाट उतार दिया जाता है। पुलिस भी उसका कुछ नहीं कर पाती, क्योंकि उस पर कुछ सत्ताधारी नेताओं का हाथ होता है, फिर बाद में वही गैंगस्टर खुद भी दुनिया को दिखाने के लिए खादी पहन लेता है और विधायक या मंत्री के भेष में अपने काले कारनामे जारी रखता है।मुख़्तार अंसारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, गिरोह चलाकर लूट डकैती अपहरण करवाने वाला गैंगस्टर, राजनीति में कदम रखता है और कुछ सत्ताधारी पार्टियां उसके खून से सने अतीत पर पर्दा डालकर उसे हाथों-हाथ लेने लगती हैं। फिर वह समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की टिकट पर चुनाव लड़ता है और प्रचंड जीत दर्ज कर विधायक बन जाता है वो भी एक-दो बार नहीं, पांच बार लगातार, जेल में रहते हुए चुनाव लड़ता है, फिर भी जीतता है। तो चलो शुरू से शुरू करते हैं :-


30 जून 1963 को उत्तर प्रदेश के एक रसूखदार परिवार में जन्मे मुख़्तार अंसारी के दादा इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष थे, जिन्हे स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका निभाने के चलते महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था, उनका नाम भी मुख़्तार ही था। वहीं MLA मुख़्तार अंसारी के चाचा हामिद अंसारी देश के उपराष्ट्रपति के रूप में देश को सेवाएं दे चुके हैं। ये वही हामिद अंसारी हैं, जिन्होंने उपराष्ट्रपति जैसे पद पर रहने के बाद भी ''भारत में मुसलामानों को डर लगता है'' कहकर एक नया बवाल खड़ा कर दिया था (अब समझे क्यों पंजाब की कांग्रेस सरकार मुख़्तार को योगी सरकार के हवाले न करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई थी)। बाहुबली के नाना मोहम्मद उस्मान भी सेना में ब्रिगेडियर थे, जिन्हे महावीर चक्र से नवाज़ा जा चुका है। 

अब बात करते हैं मुख़्तार के आपराधिक सफर की 
1980 के दौर में मुख़्तार अंसारी, मखनु गैंग का सदस्य हुआ करता था, जिसकी आए दिन सरकारी ठेकों को लपकने के लिए साहिब सिंह गैंग से भिड़ंत हुआ करती थी। साहिब सिंह गैंग का कुख्यात सदस्य बृजेश सिंह जिसने इस गैंग से अलग होकर नया गिरोह बनाया था, का कई बार मुख्तार की गैंग से खुनी संघर्ष हुआ करता था। ये गैंगवार कभी कोयले के ठेके को लेकर, कभी रेलवे कॉन्ट्रैक्ट, कभी शराब के ठेकों को लेकर हुआ करती थी और यूपी की जमीन खून से लाल हो उठती थी। 1988 में पहली बार मुख़्तार अंसारी का नाम एक हत्या के मामले में सामने आया, जिसका ट्रायल आज तक कोर्ट में चल रहा है। 1990 के दशक में मुख्तार और बृजेश सिंह के धंधे में रेल्वे, कोयला, खनन और शराब जैसे ठेकों को हथियाने की जोर-आजमाइश चलती रही। कई बार इनका आमना सामना भी होता रहता था।  1991 में मुख्तार के खिलाफ गाजीपुर के मुहम्मदाबाद थाने और कोतवाली गाजीपुर में हत्या के दो मामले दर्ज हुए। पहला मामला कोर्ट में लंबित है, जबकि दूसरे मामले में गवाहों और सबूतों के अभाव में उसे बरी किया जा चुका है। 1991 में ही चंदौली जिले के मुगलसराय में मुख्तार के खिलाफ हत्या का एक और केस दर्ज हुआ। फिर वाराणसी के भेलूपुर और चेतगंज थाने में 1990 और 1991 में उसके खिलाफ 302 का केस दर्ज हुआ, भेलूपुर वाले केस में फाइनल रिपोर्ट लग चुकी है। फिर 1996 में गाजीपुर के मुहम्मदाबाद थाने में उसके खिलाफ 302 का केस दर्ज हुआ, यह मामला भी अब तक अदालत में विचाराधीन है।  

यही वह समय था जब मुख़्तार अंसारी ने अपने ऊपर लगे दागों को धोने के लिए राजनीति में कदम रखा और 1996 में पहली बार मऊ विधानसभा सीट से बसपा विधायक बना। 1996 में तत्कालीन एएसपी उदय शंकर पर जानलेवा हमला करने का भी आरोप लगा यहां से मुख़्तार ने मुस्लिम वोटों की राजनीति शुरू की और अपने भाई अफ़ज़ाल अंसारी को भी विधानसभा का चुनाव लड़वा दिया। 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा उम्मीदवार कृष्णानंद राय ने मोहम्मदाबाद सीट से मुख़्तार के भाई अफ़ज़ाल अंसारी को हरा दिया और विधायक बने। लेकिन कृष्णानंद अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए और उन्हें उनके 6 साथियों के साथ सरेआम गोलियों से भून दिया गया, उस समय मुख़्तार अंसारी जेल में बंद था, लेकिन इस हत्या का आरोप उसी पर लगा। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि कृष्णानंद और उनके साथियों पर अपराधियों ने 6 AK-47 राइफल्स से 400 गोलियां दागीं थी, जिसमे से 67 मृतकों के शरीर से बरामद हुई। इस हत्याकांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया, जिसके बाद इसकी CBI जांच की मांग उठने लगी, मगर इसके अगले ही साल इस केस के अहम गवाह शशिकांत राय की रहस्यमई मौत ने सबको हैरान कर दिया। इस मामले की जांच करने की काफी कोशिशें की गईं लेकिन, कृष्णानंद की मर्डर मिस्ट्री आज तक उलझी हुई है। वहीं 2008 से जेल में कैद मुख़्तार अंसारी लगातार चुनाव लड़ता रहा। ऐसे आरोप भी लगे कि जेल में मुख़्तार को VIP सुविधाएं दी जाती हैं और वो जेल से ही अपना गैंग चलाता है, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ और मुख़्तार चुनाव जीतता रहा। अब जब 2017 भाजपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई तो मुख़्तार के खिलाफ शिकंजा कसने लगा और उसके ठिकाने तोड़े जाने लगे, आज भी यूपी पुलिस उसे लेकर बांदा जेल आ रही है, ताकि उसके जुर्मों का हिसाब किया जा सके। बता दें कि मुख़्तार अंसारी पर 302 यानी हत्या के 18 मामले दर्ज हैं, ये तो वो मामले हैं, जो पुलिस थानों के रिकॉर्ड में हैं, इसके अलावा न जाने कितने और अपराध होंगे, जो राजनीति की सफ़ेद पोशाख में छुपे हुए होंगे। आशा है कि पीड़ितों को न्याय मिलेगा और अपराधी को दंड। 

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