ज़िन्दगी है बहने दो...

ज़िन्दगी है बहने दो, जब तक पूरी तरह तैरना नहीं सीख जाते, ज़िन्दगी ऐसे ही बहती रहेगी। बहते हुए कुछ अच्छी चीजें हासिल जरूर होती है लेकिन सैकड़ों ऐसी चीजें है,जो न चाहते हुए भी किनारे पर खड़ी आपका इंतजार कर रही होती है लेकिन उन्हें आप हासिल नहीं कर पाते। ज़िन्दगी ऐसे खेल निरन्तर खेलते रहती है, आप अफसोस नहीं कर सकते। 

अफसोस करना सीधे-सीधे समय की बर्बादी भर है। कुछ चीजें बीत जाती है, वो लौटकर नहीं आती,वो चीजें बहाव के विपरित उन किनारों पर छूट जाती है, और आपको बाय-बाय करती है, ऐसी परिस्थितियों में आपके पास दो ऑप्शन होते है या तो तैरने का प्रयत्न करते हुए आगे बढ़ते रहे या पीछे मुड़कर देखते रहे जिससे डूबने के डर बना रहे, दूसरा ऑप्शन बेहद भयानक होता है, जो आपको लगतार डूबने पर मजबूर करता है। 

भागवत गीता की कुछ लाइन्स भी यही कहती है, जो बीत गया उस पर दुःख मनाने से बेहतर है आगे बढ़ते रहे। आगे बढ़ते हुए ज़िन्दगी के इस सफर में मंज़िल कब मिलेगी यह निर्भर करता है, आपके बहने पर। आप तैरना सीखकर आगे बह रहे है या दोनो हाथों को खुला छोड़कर सिर्फ बह रहे है। सफलता और बर्बादी बस इस बहने और तैरने पर निर्भर है। 

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