क्या हमारे लिए माँ एक ही दिन होती है खास ? हर रोज जरुरी होता है उनका आर्शीवाद

हर बच्चे की तरह हम और आप भी बहुत अजीब हैं। जो मां नौ महीने अपने कोख में हमें पालती है। जिसके आंचल में हम बड़े होते हैं, जिसके साथ हम 24 घंटे रहते हैं। साल में एक दिन उसे ही हमें कहना पड़ता है मम्मा, आई लव यू। हैप्पी मदर्स डे, मां। पहली बात तो यह कि हमें यह सब कहने की हिम्मत नहीं होती है। पता नहीं क्यों। शर्म है या क्या है। पता नहीं। लेकिन अगर कभी यह कह भी दिया तो मां को भी बड़ा अजीब-सा लगता है। सोचती है कि अब ये क्या है। या फिर आज उसके बच्चे को उससे क्या चाहिए।  

अगर आपको नही पता तो बता दें कि करीब एक दशक पहले तक देश की हवा में मदर्स-डे कहीं नहीं था। वैलेंटाइन-डे की तरह यह भी हम पर छा रहा है। धीरे-धीरे ही सही। इसमें क्या गलत है और क्या सही है। मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि इसे मनाने की जरूरत ही आखिर क्यों पड़ रही है।

भारतीय संभ्यता एक महान संभ्यता है। जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है। इतनी पूरानी संस्कृति वाले इस देश में सैंकड़ों तीज-त्यौहार, मेले और पर्व हैं। लेकिन कभी किसी समाज और संस्कृति को कोई मदर्स-डे या फादर्स-डे मनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। क्यों नहीं। क्या हमारे पुरखे बेवकूफ थे या नासमझ या अज्ञानी। अगर ये सब नहीं था तो ऐसे पर्व मनाने की जरूरत क्यों नहीं पड़ी। और पश्चिम देशों में ही ऐसा क्यों हुआ।

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