ईश्वर का अनमोल वरदान है माँ, क्यों भगवान भी हो जाते हैं नतमस्तक ?

मां एक अहसास, एक हिम्मत, एक विश्वास एक अपना सा नितांत रिश्ता है. मां के गर्भ में अबोली नाजुक आहट से लेकर नवागत के गुलाबी अवतरण तक, मासूम किलकारियों से लेकर कड़वे निर्मम बोलों तक, आंगन की फुदकन से लेकर नीड़ से सरसराते हुए उड़ जाने तक, मां के मातृत्व की जितनी परिभाषा कही जाए उतनी कम है.

मां के स्वरूप में ही स्नेह, त्याग, उदारता और सहनशीलता के कितने प्रतिमान गढ़े गए है? कौन देखता है? कौन गिनता है भला? और कैसे गिने? ऋण, आभार, कृतज्ञता जैसे शब्दों से परायों को नवाजा जाता है. मां तो अपनी होती है, बहुत अपनी सी.
 
हर किसी के जीवन में मां का बहुत बड़ा हिस्सा है. मां मनुष्य के जीवन का बहुत बड़ा अंश है. जिसका ऋण कोई नहीं चुका सकता है. ऋण चुकाने की कल्पना भी धृष्टता कही जाएगी. कितने और कैसे-कैसे अहसान हैं उसके हम पर. यदि अदायगी का मन बना लिया तो उलझ जाएंगे. भला कैसे अदा करेंगे उस ऋण को? जब आपको पृथ्वी पर लाने के लिए वह असीम अव्यक्त वेदना से छटपटा रही थी, उसका? या ऋण चुकाएंगे उन अमृत बूंदों का जिनसे आपकी कोमलता पोषित हुई? 

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