मन को झकझोरना होगा

Jun 02 2016 06:32 AM
मन को झकझोरना होगा

हिंदुस्तान में जात-पांत तब चलन में आया जब किसी भी हुनर को सही ढंग से सिखाने के लिए कोई ट्रेनिंग-सेंटर नहीं होते थे। उस हालत में परिवार ही एकमात्र वह जगह बन गया जहां ट्रेनिंग मिल सकता था। ऐसे में बहुत जरूरी हो गया था कि लोहार, सुनार या चर्मकार जैसे तरह-तरह के पेशों की संस्कृति को बनाए रखा जाए; वरना आज हमारे बीच कोई भी हुनर बचा नहीं होता।

मान लीजिए आपके पिता लोहार होते। छह साल की उम्र तक आते-आते आप हथौड़ा और निहाई से खेलना शुरू कर देते। आठ साल का होने पर जब आपके पिता देखते कि आप हथौड़ा मारने को बेचैन हैं, तो वे सोचते कि क्यों न आपसे किसी काम की जगह पर हथौड़ा मरवाया जाए! बारह साल का होने तक आप कोई काम करने लग जाते। 18-20 की उम्र होने तक दस्तकारी का एक हुनर आपकी मुट्ठी में होता ताकि अपनी जिंदगी आप खुद चला सकें।

इस तरह जिसके पिता लोहार होते, वह लोहार बन जाता था और जिसके पिता सुनार होते, तो वह सुनार बन जाता था। इस तरह हर पेशे ने अपना ट्रेनिंग सेंटर परिवार  को बना लिया क्योंकि और कोई विकल्प था ही नहीं। समाज में हर प्रकार की दस्तकारी, तरह-तरह के पेशे, तरह-तरह की कला और हुनर बस इसी तरह आगे बढ़ सकते थे। एक पेशे से जुड़े लोग दूसरे पेशे को सीखने के पीछे नहीं भागते थे, क्योंकि समाज को हर पेशे की जरूरत थी। जब आबादी बढ़ी और हजारों लोहार तैयार हो गए, तो जाहिर है उन्होंने खान-पान, शादी-ब्याह और कामकाज के अपने खुद के तौर-तरीके बना लिए और इस तरह उनकी अपनी जाति बन गई। एक तरह से देखें तो इसमें कुछ गलत नहीं था। यह समाज में सुविधा के लिए महज एक खास तरह का इंतजाम था। लोहार और सुनार के बीच हर चीज बिलकुल अलग थी, चाहे वह उनका हथौड़ा हो, कामकाज का तरीका हो, रूप-रंग और पहनावा हो या फिर उनके खान-पान की चीजें और खान-पान का ढंग हो। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनका काम-काज बिलकुल अलग-अलग तरह का था।

वक्त गुजरने के साथ कुछ ऐसा हुआ कि यह व्यवस्था शोषण का जरिया बन गई। हमने यह कहना शुरू कर दिया कि जो इंसान मंदिर चलाता है वह स्कूल चलाने वाले से बेहतर है। जो इंसान स्कूल चलाता है वह लोहार की दुकान चलाने वाले से बेहतर है। सच कहें तो यह तो बस काम का फर्क है; हर किसी को कुछ न कुछ करना है। लेकिन समय के साथ हमने काम के इस फर्क को भेदभाव में बदल दिया। अलग होना अच्छी बात है। दुनिया में चीजें अलग-अलग तो होंगी हीं और यह अच्छी बात है कि यहां विविधता है। लेकिन हम हर फर्क को, चाहे वो इंसान की प्रजाति का फर्क हो चाहे धर्म या लिंग का – भेदभाव के नजरिए से देखने लगते हैं। अगर हमने फर्क को बस फर्क रहने दिया होता, तो हमारी संस्कृति एक खूबसूरत बहुरंगी संस्कृति होती। लेकिन जब हमने होश गंवा कर हर चीज को भेदभाव का आधार बना दिया, तो जातिप्रथा एक बहुत बुरी प्रथा बन कर रह गई। जो प्रथा कभी समाज में हर प्रकार के हुनर को बढ़ावा देने का एक सुंदर तरीका थी बदकिस्मती से वह भेदभावपूर्ण और नकारात्मक बन कर रह गई जो अब समाज को कोई फायदा नहीं पहुंचा पा रही है।

इंसान हर फर्क को भेदभावपूर्ण बना देता है। इसका कारण सिर्फ यह है कि हर कोई अभी जिस भी स्थिति में है उससे ऊपर उठने की ख्वाहिश रखता है, जितना भी उसके पास है, उससे ज्यादा पाना चाहता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसके लिए उसने अपने आसपास के लोगों को नीचे गिराने का तरीका ढूंढा है। दरअसल उसकी ख्वाहिश जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा हथियाने की होती है। चूंकि वह नहीं जानता कि खुद को कैसे बुलंद करे, इसलिए वह यही बेहतर समझता है कि किसी और को नीचे गिरा दो। यह मानसिक पिछड़ापन है, लेकिन एक लंबे अरसे से हम यूं ही करते रहे हैं और ऐसा ही करते जा रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि हम इसको बदल डालें। लेकिन पुरानी जातिप्रथा को खत्म कर देने भर से बदलाव नहीं आने वाला, किसी और रूप में यह फिर जड़ें जमा लेगी। न्यूयार्क की ही बात ले लें। आपको क्या लगता है कि वहां जातिप्रथा नहीं है? आप गलत हैं, वहां शिक्षा और  पैसे कमाने की काबिलियत के आधार पर एक अलग तरह की जातिप्रथा चल रही है। ये सभी चीजें अपने ही ढंग से भेदभाव पैदा करती हैं। इसलिए जब तक हम इंसान के मन को झकझोर कर जगाएंगे नहीं तब तक कुछ नहीं बदलने वाला।

अगर खुद में सबको मिला लेने की, अपना बना लेने की भावना इंसान में नहीं होगी, तो चाहे जो प्रणाली बना लें, चाहे कुछ भी कर लें, वह कभी सबको साथ ले कर नहीं चलेगा। सबको मिलाने की भावना न होने पर इंसान सबसे अलग-थलग अपने खुद के तरीके बना लेता है। आध्यात्मिक प्रक्रिया बुनियादी तौर पर इंसान को इस काबिल बना देती है कि वह सबको साथ ले कर चल सके। साथ-ही-साथ यह उसे ज्यादा कारगर, ज्यादा काबिल और ज्यादा संतुलित बना देती है जिससे समाज में वह और ज्यादा योगदान दे सके ।