संसद में सरकारी खाद्य सुरक्षा से महरूम सांसद

भारत की जनता के नसों में खून नहीं 15 रुपये लीटर वाला मिनरल वाटर आसुत जल बह रहा है वो भी विदेशी कोल्ड ड्रिंक्स की दो - चार बूंदो से उबलना भूल कर शांतमय अपने ही धुन व स्वार्थ में भौतिकवाद के ट्रैफिक में अविरल बह रहा है | ये सभी भगवान के गर्मी, शर्दी, बारिश, ओले, बाढ़, भूकम्प, सुनामी जैसे नए रिकॉर्ड के तले "कर" चूका के सड़को पर साँप सीढ़ी खेलते हुए अपने मात्र 540 प्रतिनिधियों या सांसदों को प्रत्येक माह हज़ारो रुपये तनख्वाह, स्टाफ खर्च, टेलीफोन, मोबाइल, लाइट, पानी, गाड़ी, हवाई यात्रा, ट्रैन यात्रा, निजी सुरक्षाकर्मी आदि सुविधाओ में करीबन 3 लाख भारतीय रुपये न की डॉलर तारीख दर तारिक दे रहे है | 

इन माननीय, हितप्रेमी, उनकी आबरू व भविष्य बनाने वाले प्रतिनिधि के मुह का निवाला छीन कर कोई खा रहा है तब भी इनके पास वक्त नहीं की वो इनके समर्थन में रोड पर उतरे | ये सिर्फ बड़ी बड़ी बातें करेंगे दाले, सब्जी, आटे, मिठाई के भाव सेंचुरी के रनों से ज्यादा होने का रोना रोकर मंत्रियो व सरकार पर दोषा रोपण करेंगे व कार्टून से कटाक्ष कर कर के घोर कलियुग आने का कहकर अपने बीबी बच्चों का निवाला छीन उल्टे धार्मिक स्थलों में 56 भोग बनाने के लिए दे आयेगे ताकि उनके ईस्ट देव / भगवान / माता जी / अल्लाह / इशू / मदर मेरी / गुरु साहिब मरने के बाद इस पाप और अधर्म से मुक्त रखे | चार शेरो के मुख वाली छाप रखने वाली भारत सरकार इतने असह्य, दिशाहीन, सोचहीन, व कर्म विहीन नहीं है की उसके पास रोकने का कोई उपाय ही नहीं हो | 

समस्या यह है की उसकी आँख, नाक, कान जीभ, मुह कहे जाने वाले संसक के सेकड़ो कर्मचारी, हजारो सुरक्षाकर्मी, पड़ताल पर जाने वाले मीडियाकर्मी, पार्टी के जी हुजूरी करने वाले छुट भैय्या नेता ही इन सांसदों के नाम से करोडो रुपये का भोजन व नास्ता बिना डकार लिये चट कर रहे है | इसलिए सरकार तक असली जानकारी मोहय्या ही नहीं हो पा रही है | इसे अप्रयत्क्ष रूप से रिश्वत भी कह सकते है क्यों की बाजार व असली जिंदगी से कई गुना कम भाव वे उन्हें चाय 1 रुपये, सूप 5.50 रुपये, एक कटोरी दाल 1.50 रुपये, खाने की पूरी शाकाहारी थाली 12.50 रुपये, मांसाहारी खाने की थाली 22.00 रुपये, चपाती 1 रुपये, डोसा 4 रुपये, एक कटोरी खीर 5.50 रुपये, व अन्य पकवान कम दिखने वाले 1 , 2 , 5 व बाद हो चुके 25 और 50 पैसे के अंतर पर मिल जाते है | 

125 करोड़ की आबादी से कई स्तरों की परीक्षाओ व इंटरव्यू से चुने गए करोडो कर्मचारियों में एक भी ईमानदार, राष्ट्र-प्रेमी, देश-भक्त, हितेषी, कर्तव्यनिष्ठ, नेट सर्फिंग कर सकने वाला व अख़बार पढ़ सकने वाला हो तो सरकार तक यह जानकारी पहुंच जाएगी की "पैसा सीधे बैंक खाते में" जो स्कीम लोकतंत्र के मालिक आम जनता के उप्पर लागु कर रखी है व इतनी सफल है तो उसकी सुरक्षा भी जनता के प्रतिनिधि सांसदों को भी दिला दे तो बड़े घोटाले से बचा जा सकता है व जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के साथ खाने जैसी मुलभुत सुविधा में कमी के कारन बड़े बड़े कानून बनाने से न रुके, ताकत व मसल बन जाने के कारण संख्या बल नहीं होने पर भी कोई भी बदलाव करा सके या कानून बने से बेहिचक रोक सके | इस उपाय से उनके पैसे बैंक कहते में पहुंच जायेगे जिससे वे बैफिक्र होकर काम कर सकेंगे आख़िरकार जोर जोर से चिल्लाने, चीखने, नारे लगाने वो भी बीच गैलरी व सभापति के पास जाकर बड़ा ही मेहनती व केलोरी वाला काम है |

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