क्या दिल्ली की कुर्सी पर टिकी हुई हैं ममता 'दीदी' की निगाह ?

क्या दिल्ली की कुर्सी पर टिकी हुई हैं ममता 'दीदी' की निगाह ?

कोलकाता: सिंगूर और नंदीग्राम में लगभग 10 साल पहले सत्तारूढ़ वामपंथी सरकार के विरुद्ध परेशान, भूखे और हजारों आक्रोशित लोगों का नेतृत्व करने वाली ममता बनर्जी को शायद ही उस वक़्त यह पता रहा हो कि वे इतिहास की एक नई पटकथा लिखने जा रही हैं. यह तो 10 वर्ष पहले की बात हो गई. ममता बनर्जी एक बार फिर देश की सियासत के केंद्र में आ खड़ी हुई दिखाई देती हैं. 

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अगर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत एनडीए सरकार 2019 के लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत लाने में नाकाम होती है तो, बनर्जी भले खुद शीर्ष पद पर काबिज न हो पाएं, किन्तु सत्ता की चाभी यानी किंगमेकर की भूमिका जरूर निभा सकती हैं. पीएम मोदी और भाजपा की मुखर आलोचना करने वालों में से एक ममता बनर्जी ने अब तक अपनी छवि ऐसी बनाई है जो सत्तारूढ़ एनडीए को सत्ता से बेदखल करने की चाहत रखने वाली विपक्षी पार्टियो को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. ममता बनर्जी इस वर्ष जनवरी को आयोजित की गई एक रैली में एक मंच पर 23 विपक्षी पार्टियों के तमाम नेताओं को साथ लाने में सफल रही थीं.

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तृणमूल कांग्रेस के नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा है कि, ‘‘ममता बनर्जी की अगुवाई में आगामी नई सरकार में हम अहम् भूमिका निभाने जा रहे हैं. देश की आवाम नरेंद्र मोदी के खौफ के शासन से बचाने के लिए बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की ओर देख रही है.' इससे संकेत मिलता है कि तृणमूल कांग्रेस अध्यक्षा ममता बनर्जी की नजर दिल्ली के सिंहासन पर है.

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