अर्जुन ने प्राप्त किया मां दुर्गा का आशीर्वाद

टीवी का जाना माना सीरियल महाभारत (Mahabharat)की अब तक की कहानी में आपने देखा है कि युद्ध के लिए दुर्योधन और पांडवों की सेना कुरुक्षेत्र के मैदान पर पहुंचती है। वहीं, आज सुबह के एपिसोड में दिखाया गया है कि कुरुक्षेत्र में डेरा डालने के बाद पांडव और भीष्म पितामह काफी परेशान नजर आते हैं। वहीं कोई भी अपने परिवार के लोगों से युद्ध करने के लिए तैयार नहीं है। ऐसे में युद्ध से पहले युधिष्ठिर काफी निराश नजर आए। तो वहींं, दूसरी तरफ अर्जुन, दुर्योधन और कौरवों से मिले अपमान को याद करके तिलमिला जाता है।इसके साथ ही  वह बड़ी ही बेसब्री से युद्ध का इंतजार कर रहा है क्योंकि उसको द्रौपदी के अपमान का बदला लेना है।  

इसी बीच श्रीकृष्ण अर्जुन के पास पहुंचते हैं और युद्ध में जीत हासिल करने के लिए मां दुर्गा की पुजा करने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन मां दुर्गा की उपासना करते हैं। इसी बीच दुर्गा मां अर्जुन को दर्शन देती हैं और जीत का आशीर्वाद देती हैं। ये बात अर्जुन श्रीकृष्ण को बताता है। ऐसे में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मां का आश्वासन मिलने के बाद अब पीछे हटने की कोशिश मत करना।  दूसरी तरफ गांधारी भगवान शिव से अपने बच्चों की सलामती की दुआ मांगती है और प्रार्थना करती है कि सब जल्द ही ठीक हो जाए। गांधारी कौरवों के साथ-साथ पांडव और कुंती के लिए भी दुखी नजर आती है। वह रो-रो कर अपने दिल का हाल भगवान को सुनाती है। कुछ ऐसा ही हाल कुंती का भी है। वहीं ऐसे में विधुर कुंती को ज्यादा परेशान न होने के लिए कहता है। कुंती भी पांडवों और कौरवों की इस लड़ाई से परेशान है। उसको पता है चाहे जीत किसी की भी हो लेकिन हार तो हस्तिनापुर की ही होगी।  

आपकी जानकारी के लिए बता दें की महाभारत की कहानी में आगे पांडव और कौरव सभी के साथ भीष्म पितामह के पास पहुंच जाते हैं और युद्ध के नियम बना लेते हैं। भीष्म पितामह के बनाए नियम मानने के लिए सभी लोग हामी भर देते हैं। जिसके बाद श्रीकृष्ण कर्ण के पास जाते हैं और उसको नियमों के बारे में बताते हैं। श्रीकृष्ण कर्ण को सुझाव देते हैं उसे अपने भाई अर्जुन के साथ लड़ाई नहीं करनी चाहिए। वैसे भी युद्ध में भीष्म पितामह किसी भी योद्धा को खुद से पहले नहीं जाने देंगे। वहीं कर्ण श्रीकृष्ण की बात मानने से इनकार कर देता है और बताता है कि द्रौपदी के साथ बुरा व्यवहार करने का उसे बहुत अफसोस है। इसके बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्ण के मन की व्यथा बताते हैं।

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