हर नमाज़ में जरूरी है मगफिरत की दुआ

रमजान के माह को  कुरान-ए-पाक की दोस्ती का महीना कहा जाता है. इस माह में ही पैगम्बर मोहम्मद साहब को अल्लाह ने कुरान-ए-पाक को जमीं पर लाये थे. रमजान के पाक महीने के शुरुआती दस दिनों का पहला अशरा गुजरने के बाद से ही रविवार को इसके दूसरे अशरे की शुरुआत हो रही है.

इस पाक महीने में अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी और नेमतें मांगनेका सिलसिला सरे अशरों में चलता रहता है. इन अशरों का बहुत ही खास महत्त्व होता है. दस दिन के समय को एक अशरा कहा जाता है, इस प्रकार रमजान के महीने में तीन अशरे होते है जिनका अपना ही महत्त्व होता है.  इस मुकद्दस माह के पहले अशरे को रहमत का अशरा कहा जाता है इस अशरा में अल्लाह की रहमतें और दुआएं मांगी जाती है.

रमज़ान के दूसरे अशरे को मगफिरत का अशरा भी कहते है. मगफिरत का अर्थ होता है मोक्ष अर्थात इस दूसरे अशरे में रोज़दार जाने अनजाने में अपने किए गए सभी गुनाहों के लिए अल्लाह से माफ़ी मांगता है और दुआ करता है कि ऐसा पाप दोबारा ना हो.

 
रमजान के आखिरी दस दिनों को तीसरा अशरा कहते है. जिन लोगों से पहले और दूसरे अशरे की इबादत में कोई कमी रह गई है, वह तीसरे अशरे में अपनी सभी गलतियों को सुधारते है. रमजान के इस तीसरे अशरे में रोज़दार अल्लाह से जहन्नुम से आजादी मांगते है. वह दुआ करते है कि मृत्यु के बाद उनकी रूह को जन्नत-ए-पाक हसिक हो ना कि जहनूम.

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