मृत्यु से सीखा जीने का ढ़ग

सरोवर के किनारे एक संत का आश्रम था वहाँ वे सारे नियम धर्म व संयम किया करते थे। एक बार वहाँ एक राहगीर आया और बोला संत जी आपका जीवन कितना सुखद और शांति से व्यतीत हो रहा है।आप बहुत महान हे मेरा जीवन तो कष्टो से भरा दुखमय हे अनेकों परेशानियाँ जीवन मे अगड़ाई ले रही हे मेरी आप से यही प्रार्थना हे कि मेरे सुखद जीवन के लिये पथ प्रदर्शित करें। संत उसकी बात सुनकर कुछ समय के लिये चुप रहे, उसने पुन: संत जी से पूछा आप चुप क्यों हे कुछ तो बताइये संत बोले बेटा तू भविष्य कि चिंता छोड़ दे अब तेरे जीवन के केवल सात ही दिन शेष हे अतः पहले की तरह ही अपना जीवन व्यतीत कर अब तुझे इन सभी बातों की चिंता नहीं करनी चाहिये।

संत की सारी बातों को सुनकर व्यक्ति के अंदर मृत्यु का भय जागा और उदास होते हुए घर गया और पत्नी से बोला, मैंने तुम्हें जीवन में बहुत कष्ट दिये हे मुझे क्षमा करो। बच्चों से भी माफी और बोला मेने तुम्हें बहुत प्रताड़ित किया हे उसके लिए क्षमा चाहता हूँ। जिन व्यक्तियों के साथ उसका गलत व्यवहार था उन सब से क्षमा याचना व्यक्त की। इसी तरह उसके ये सात दिन व्यतीत हो गए, पर उसकी मृत्यु नहीं हुई। वह फिर संत के आश्रम पहुंचा और बोला, संत जी आपने तो कहा था मेरा जीवन केवल सात ही दिनों का हे पर मैं अभी तक जीवित हूं ।

अब आप ही बताइये कि मेरे जीवन की अंतिम घड़ी में अब कितना समय शेष है संत बोले बेटा तेरी अंतिम घड़ी तो भगवान ही बता सकता है पर तूने अपने इन सात दिनों में क्या किया वह बोला की मेने अपने जीवन मे जो भी गलत काम किये हे उन पर पश्चाताप कर लोगों से माफी मांगता रहा संत बोले बेटा जिन बातों को ध्यान में रखकर तूने यह सात दिन जिस तरह बिताए हैं, हम संत लोग उसी को सामने रखकर सारे काम किया करते हैं। यह देह क्षणभंगुरता का प्रतीक हे कभी भी नष्ट हो सकती है, इसे एक दिन मिट्टी में मिलना है। इस लिए हर व्यक्ति को अच्छे कार्य करना चाहिए किसी के साथ गलत व्यवहार न करें ताकि जीवन मे परेशानियों का सामना करना पड़े।

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